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करार न था

बाट देखें भी तो कब तक कोई आने का करार न था बैठें हैं राह में के कहीं वो ये न कहे आज मेरा इंतज़ार न था सुबह से शाम हो गयी और शाम अब रात में तब्दील हुई जाती है सोये जब आँखों में नींद तो थी गरचे नींद का खुमार न था उफक के सभी अख्तर बेसब्र हुए जाते हैं बेचारे तुम्हारी चाहतों में क्यूँकर उनका शुमार न था

फिर पहचान होगी.....

उनसे मिलने का न कोई जरिया है न तरकीब और न उम्मीद कोई, मगर इस बात पे ऐतबार है, के ज़िन्दगी कभी तो मेहरबान होगी कभी तो फिर मुलाक़ात होगी, कभी तो फिर पहचान होगी....

फ़क़त मुद्दत-ए-जुदाई को रोते हैं....

खुली आँखों में भी उसका ख्वाब बसता है उसकी हसरत में ये दिल तरसता है उसको मेहमान करने की ख्वाइश मन में है जिसका रास्ता मेरे दिल से होकर गुज़रता है कई मर्तबा एक शोर उठता है सीने में जिसकी चुप्पी ज़माने को सुनाई देती है मेरी आँखों से सबको इल्म हो गया है आजकल हमारी चर्चा ज़माना करता है ये ज़िन्दगी आखारिश मुक्कम्मल होगी फ़क़त मुद्दत-ए-जुदाई को रोते हैं फिर एक दिन लौटना है उसे के अब यहाँ वक़्त भी उसका इंतज़ार करता है

मानिंदे दीवानगी

अब बेचैनियाँ भी बेचैन हो गयी हैं तेरे रास्तों को तकते तकते...... मेरी रहगुज़र की धूल भी तेरे सजदे को बेकरार है तू सबब है मेरी बे=तस्किनियों का तू वजह मेरी उनींदी रातों का नहीं जानता कोई और यह मेरे दिल को तेरा इंतज़ार है शब् भर जो ख़्याल जगाता है एक पलक सुलाके जगाता है उस बे-परवाह को गर्चे पता नहीं जिस से मुझे मानिंदे दीवानगी प्यार है.....

पराया ....

तन्हाई को ओढ़कर जीए जाते हैं नाब-ए-ज़हर हम पीये जाते हैं भीड़ में घिरे रहते तो हैं हर वक़्त लेकिन, एक अपने की तलाश किये हैं जो पराया था अपना बन के सताता है कैसे हर शब ख्वाब बन के आता है कैसे क्यों ज़िन्दगी उसको अब तक ढूँढती है क्यों उसका इंतज़ार रोजाना किये जाते हैं न हाथों की लकीरों में समाया है न तकदीर ने उसे हासिल कराया है न रिश्तो नातों का बंधन है उसपे फिर क्यों हम उसकी हसरत किये जाते हैं एक चाँद बस सांझा है हमारी दूरियों में बहुत दर्द दिल सहता है हमारी मजबूरियों में जागते हुए उस पराये का नाम नहीं ले सकते नींद में मगर उसको आवाज़ दिए जाते हैं

तुम्हारा चाँद

ये चाँद भी अब हमारा रकीब हो गया तुम्हारे दिल के इतना करीब हो गया!!!! हमको भुलाकर चाँद को पास बुला लिया हमारे दर्द का इलाज उस से करा लिया!!!! मगर इतना क्यूँ आप इतराते हैं हजूर, चाँद आपके पहलू में है तो ज़रूर लेकिन वो एक बेवफा महबूब है सारे आसमा को वो माशूक है हमारी बा वाफाई तो आपको रास न आई उस बे-मुरव्वत की शोखीयाँ आपको भाई कोई बात नहीं हमदम मेरे वक़्त वो भी आएगा जब तुम्हारा चाँद अमावस पे छुप जायेगा तब तुम्हें हमारी यादें ही पनाह देंगी और मेरी बाहें फिर तुम्हे अपना बना लेंगी उन लम्हों के इंतज़ार करना मेरा नसीब हो गया के जब से ये चाँद तुम्हारे दिल के इतना करीब हो गया……

काश.....

काश तुम भी किसी की दीवानगी में घायल होते काश तुम भी किसी की चाहत में यूँ पागल होते तुमको गहराई अपने प्यार की दिखा तो तुम भी शायद हमारी तन्हाईयों के कायल होते... ये हमारे दरम्यान जो गुज़रा, खता थी मेरी तुम्हारी नाराज़गी अब कज़ा थी मेरी उनसे मिलने का वक़्त कम था और दूरियां बे-हद काश तुम हमारे इस दर्द-ए-जुदाई में शामिल होते.....

तुम लौट आओ....

मेरी ज़िन्दगी बिन तेरे, आधी अधूरी इक किताब, इक सफे पे अपना नाम, लिखकर इसे पूरा भर दो मेरी ज़िन्दगी बिन तेरे, टूटा हुआ सा इक खवाब, आके नींदों में मेरी, ख्वाब मेरा पूरा कर दो मेरी ज़िन्दगी बिन तेरे, बिना सुरूर की शराब, पीके संग मेरे इक जाम साकी को तुम खुश कर दो मेरी ज़िन्दगी बिन तेरे मुझ पर पड़ा हिजाब, उठा के इस चिलमन को, दामन मेरा आज भर दो मेरी ज़िन्दगी बिन तेरे, इक उखड़ा हुआ जवाब, सवालों के सुलझा के, सारे गुंजल सीधे कर दो.

सब्र कर ....

सब्र कर ए दिल के बस अब दीदार होगा वस्ल का सपना अपना तभी साकार होगा उनके आगोश में समाने की तमन्ना है हमारी उनको भी ज़रूर हमारा इंतज़ार होगा ........ दिल की खलिश ... दिल से उदासी नहीं जाती , उसकी याद जाकर भी नहीं जाती , रोक रखे हैं उसने अपने सपने भी , ये खलिश दिल से नहीं जाती ….

तेरी सदा का इंतज़ार

कल तक जो राह तकते थे हमारी, आज हमें उनका इंतज़ार दिन भर रहा मसरूफियत थी बहुत लेकिन फिर भी, ये दिल हमारा बेकरार, दिन भर रहा रात कट गई पलकों के किनारे गुजर सपनो को उनका इंतिज़ार शब भर रहा आलम-ए-मदहोशी से होश में आने का, ये बहका दिल बेकरार शब भर रहा होठों पे रुका रुका शरमाया सा, दबा हुआ तरसता हुआ, इकरार दिन भर रहा बुलाओ मुझे फिर से इक बार पलट के, के तेरी सदा का इंतज़ार दिन भर रहा…

तमन्ना-ऐ-वस्ल-ऐ-यार

रूह से रूह बात करती है फिर हम वस्ल की तमन्ना क्यों करें तेरी नज़रों से गुफ्तगू जाती रहे लबों से लफ्जों की कामना क्यों करें हरेक गोश में बैठे हैं तेरे ख्वाब यहाँ तेरे न होने का शिकवा क्यों करें वो हर शय तो मिल नही सकती उस हर शय का तकाजा क्यों करें जब ख्यालों में जी लेते हैं बेशक उस पे तेरे न आने का गिला क्यों करें बहुत मेहरबानियाँ हैं यूँ भी हम पे और इस से अब तमन्ना क्यों करें....

अब हम क्या करें

कुछ और करने के काबिल रहे नहीं तुझसे प्यार भी न करें तो अब क्या करें? होंठों पे लगी चुप तेरे कहने पे नज़र-ए-इकरार न करें, तो अब क्या करें? दस्तूर गर बदल सकते रवायतें मोहब्बत का, तो सदियों पहले बदल चुके होते... कहते हो, के न चाहें तुम्हें इस कदर, तो तुझसे तकरार न करें, तो अब क्या करें? तेरे साथ जीने की आरजू में, कई जनम गवां बैठें हैं तनहा-तनहा इस जिंदगी में भी तू छुडाये दामन, फिर मौत का इंतज़ार न करें, तो अब क्या करें? तुझे भुलाने की कोशिशें बेकार गयीं यादें झांकती हैं झरोखों से, रात भर अकेले में आ आकर बहलाती हैं इसलिए, नींदें अपनी खराब न करें, तो अब क्या करें? न बाद -ए -नसीम, न खुशनुमा पल मेरी जिंदगी में किसी की जगह नहीं सिर्फ तुझ तक दिखे जब सारी खुदाई उस खुदाई को स्वीकार न करें, तो अब क्या करें?

एक ख़त तुम लिख दो

एक ख़त मेरे नाम तुम लिख दो, दो लफ्जों में अपना पैगाम लिख दो; पूछते पूछते नामाबार से थक गयी जुबां, अब तो अपने दिल का हाल तुम लिख दो; थकती जाती हैं निगाहें उसकी राह में, उम्मीद नही टूटी मगर तेरे प्यार में; रहते हैं हर वक़्त बस इंतज़ार में, अब तो इजहार-ए-कलाम तुम लिख दो, तुम्हें तुम्हारे बेशुमार सज्दों की कसम; उन बोलती हुई खामोश निगाहों की कसम, कबूल करेंगे हम उन्हें सर-आँखों पे, अब तो छोटा सा इक सलाम तुम लिख दो; तुम्हारी बे-पनाह चाहत से हम नावाकिफ थे, छुपी हुई बेबाक मोहब्बत से हम नावाकिफ थे; जाना है देर से, हाँ ये कसूर है लेकिन, अब तो इजहार-ए-ख़याल तुम लिख दो; पूछते पूछते नामाबार से थक गयी जुबां, अब तो अपने दिल का हाल तुम लिख दो..