Posts

Showing posts with the label सामाजिक

एक आम आदमी

हर कमान आज खाली है तेरे तीर से खामोशी बंध नहीं सकती ज़ंजीर से रोक नहीं सकते वक़्त-ए-गर्दिशी को क्या लडेगा कोई भला तकदीर से जंग जारी है ज़माने भर में आज हर तरफ इल्जाम हैं संगीन से मौत की ख्वाइश न कर बाशिंदे तू मौत भी यहाँ मिलती है तकदीर से ...

JAGRAN

कब तक और कब तक फसले-गुल के मौसम में गोलियां उगायेंगे? पड़ोसी मुल्क के बाशिंदे हमारा कितना लहू बहायेंगे? और हमारे देश के लोग कब होश में आयेंगे? शहीदों की मौत पर कब नकली नेता सच्चे आंसू बहायेंगे? सचमुच जिंदगी इतनी सस्ती है कब हम इसके सही मोल लगायेंगे? जगाया उसको जाता है जो सोया होता है जागे हुओं को कितने बम्ब जगायेंगे? बस, अब हद से बाहर हो गया बर्दाश्त भी और नहीं होता और कितने दंगों के बाद हम हिन्दुस्तानी गनीम-ए-शहर में आतिश्बारी करवाएंगे? शर्म औरत का गहना होती है लगता है अब आदमी उसको अपनाएंगे और चूड़ियाँ पहनने वाले हाथ आखिरकार बंदूकें उठाएंगे... गर बुरा लगा तो बुरा मान लो और हिम्मत-ए-मर्दा-मदद-ए-खुदा जान लो उठा लो तलवार बाँध के कफ़न चलो यूँ ही सही उकसा कर हम अपने लोगों को बहादुर बनायेंगे... बहुत झुक लिया, बहुत सह लिया अब और नहीं सह पायेंगे आज प्रण करो...खुद से हम अपने देश को इस आतंक इन आतंकवादियों से बचायेंगे! गनीम-ए-शहर - दुश्मन देश

For the soilders/policemen who lost their lives fighting terrorism in mumbai...26/11/2008

समेट कर आग सीने में जब वो घर से निकला होगा आग बुझाने को कितने आईने देखें होंगे अपनों के अक्सों को आँखों में छुपाने को रात में नीदों का साया फिर नहीं आएगा उसके मकां पे वो अपना आशियाना छोड़ कर गया था औरों के घर बचाने को तान के बन्दूक जा खड़ा हुआ बन्दूक के आगे शेर दिल लौटा नहीं जिंदा, तो क्या फौजी बना ही था मुल्क पे मर जाने को कुछ सरकारी तमगे मिलें और मिला कुछ लाख का मुआवज़ा अब सलाम करें या शहादत का नाम दें के वो मरा देश बचाने को किसके साथ क्या हुआ कौन मरा कौन बचा और फिर वो ही मुक्कदमा इन्साफ की मत पूछो, के इन्साफ यहाँ का है सिर्फ खिल्ली उडाने को उस मुल्क पे ओड़ के गुनाहों का सारा इल्जाम अपना गिरेबां झाड़ लिया इस मुल्क का नेता जीता है मासूमों के लहू से अपनी प्यास बुझाने को

Bihar: बिहार की त्रसिदी को समर्पित ....

पानी के थपेडो में तूफान के अंधेरों में नाखुदा का इंतजार करती कितनी बेफरियाद है ये जिंदगी कुछ बेजार सी लगती है कुछ नाराज़ सी लगती है, अपनी तो है लेकिन बड़ी बरबाद है ये जिंदगी दुओं की आदत नहीं अजाब से खौफ नहीं बिन उम्मीद की बेहद नामुराद है ये जिंदगी हर रोज दिन से शुरू होकर हर रात यूँ ही सो जाती है क्या उस दुनिया में सबकी यूँ बेबुनियाद है ये जिंदगी हरसूं एक शोर है हरसूं एक सन्नाटा भी गूंगी बहरी लेकिन जिन्दा क्यूँ इतनी बेजार है ये जिंदगी सैलाब एक नाशादियों का भूख का बरबादियों का गहरे-उथले पानी में कैसे आबाद है ये जिंदगी एक उम्मीद बाकि है कहीं तो इंसानियत जागी है जोश -ए-जूनून की लेकिन क्यूँ मोहताज है ये जिंदगी कुछ रुकी रुकी सी कुछ थमी थमी सी एक नयी सुबह की करती इजाद है ये जिंदगी

इरतिका-ए-जिंदगी

तुम कहते हो सुनो, दर्द उनकी सिसकियों का मैं कहती हूँ, मैंने देखा ज़ख्म जहाँ थे उस देश के लोगों को गवांरा था यूँ घुट के मरना उस देश की लोगों में लड़ने के हालात कहाँ थे हर सरकार लूटती थी हर शहर हर गली को उनके आगे चंद लोगों के नाल-ए-फरीयाद रवां थे फिर भी पत्थर कूटते उन हाथों में हर वक़्त मुल्क की इरतिका-ए-जिंदगी के अरमान जवां थे इरतिका-ए-जिंदगी - progress of life

सांझी ज़मीं

दर्द सांझा, लहू सांझा, सांझी ये ज़मीं है हरेक मगर इसमें एक टुकडा मांगता क्यों है? *** एक मजहब, एक ज़ात, एक ही जज़्बात है, कमबख्त आदमी ही आदमी को नहीं पहचान पाता

इंसान की सोच

सोचना फितरत है इंसान की सोचना फिर आदत बन जाती है ये इंसान की सोच ही होती है जो उसको चाँद की सैर कराती है सागर का सीना चीरना कोई बच्चों का खेल नहीं इंसान की सोच ही उसको जहाज़ बनाना सिखाती है आसमान की ऊँचाइयों पे कब्ज़ा है पंछियों का सदियों से एक सोच इंसान की उस आसमान तक जो झुका जाती है सोच अगर सही तो इर्तिका-ए-जिंदगी मिलती है सभी को अगरचे बेकार सोच इस जहाँ मैं सिर्फ तबाही मचाती है

तो कोई बात है

छोड़ के नफरत मेरी करीब आओ तो कोई बात है भूल कर ग़मों को मुस्कुराओ तो कोई बात है धूप में तो सब गुज़ारा कर ही लेते हैं मर खप कर तूफानी गलां में जी कर दिखाओ तो कोई बात है फिरदोस है जन्नत है इसमें किसको शक भला हाँ, दोज़ख में खुशियाँ बिछाओ तो कोई बात है दरिया में उतरते हैं तो पार लग ही जाते हैं डूब कर सागर करीं आ जाओ तो कोई बात है हर एक शख्स अपनी असीरी में सदियों से कैद है दुश्मनों की जंजीरें तोड़ आओ तो कोई बात है फूल हैं तो महकेंगे ही के उनकी ये ही फितरत है सहरा में गुलशन को बसाओ तो कोई बात है

शहर के लोग

मेरे शहर के लोग बड़े मसरूफ रहते हैं खुद ही खुद के नशे में चूर रहते हैं इश्क क्या है और उसकी शिद्दत क्या इन बातों से बहुत दूर रहते हैं ठीक है के हर बाशिन्दे के सिर पे सलीब है सच है के हर शक्स अजीब है अपनी शक्सियत का रुबाब को छोड़ के यहाँ माशूक का गुरुर सहते हैं कोई गिला नहीं है गर वस्ल-ओ-प्यार न हुआ कोई शिकायत नहीं गर दीदार-ए-यार न हुआ अजीब लोग हैं अजीब रवायेतें हैं के यहाँ सब्र से आशिक दर्द-ए-नासूर सहते हैं

लाश की मंडी लगती है....

चौराहे पे ये दुनिया कितनी खूबसूरत दिखती है मगर यहाँ इंसानियत हर मोड़ पे बिकती है ए दोस्त, न आंसू बहा किसी भी जनाज़े पे के हर चौराहे पे लाश की मण्डी लगती है कहीं खून खून को नही पहचानता कहीं बचपन की कहानी जवानी में ढलती है ए दोस्त इस ज़मीन पे ऐसा भी होता है औरत की आबरू सरे-आम लुटती है... सिर्फ मतलब की इस दुनिया में हर चीज़ की कीमत होती है हर शय का सौदा होता है हर रूह पे बोली लगती है

Against the paintings of Hindu gods - M.F. Hussain

ये लोग जो दिलों को बांटने का काम करते हैं के अपनी तस्वीरों में खुदा को बदनाम करते हैं क्या उनका खुदा हमारे खुदा से अलग है गर नही तो ये क्यों ऐसा अंजाम करते हैं किसी शख्स की सूरत मज़हब नहीं बनता है कौन सा धरम जो नफरत को है सिखाता ये चन्द लोग परदे को बेपर्दा सरे आम करते हैं कुछ लोग जो दिलों को बांटने का काम करते हैं क्या उसका वजूद मेरे वजूद से इतना जुदा है? क्या हिजाब में सजता सिर्फ उसका खुदा है? क्यों फिर हमारी बेटियों को वस्त्रहीन सुबह शाम करते हैं ये चन्द लोग जो दिलों को बांटने का काम करते हैं तुम हिन्दू हो तो काफिर हो हम मुस्लिम है हम काबिल हैं तुम दोज़ख के हक़दार हो हम जन्नत के हासिल हैं ऐसे शैतानी इरादों को चलो हम नाकाम करते हैं इन चन्द लोगों को बेनकाब चलो सरे आम करते हैं

Global warming

इस बरस भी बारीश होगी इस साल भी बादल छायेंगे बूंदे तो उनके साथ होंगी लेकिन धरती के मौसम बदल जायेंगे ये कुदरत भी रो पड़ेगी और सारी इंसानियत आंसू बहायेगी जब सहरा तो सहरा रहेगा मगर जंगल भी सहरा बन जायेंगे इस हयात की ना पूछ ए दोस्त मेरे यहाँ ऑर हर कोहराम होगा जब दरख्तों पे परिंदे न होंगे और सारे पहाड़ पिघल जायेंगे हर तरफ दिन रात सिर्फ एक आग होगी, ओर होगी तिशनगी की एक इन्तहा हर रोज़ जब के काफिले निकलेगा ओर पानी को ढूँढने जायेंगे न दरिया कोई रहेगा बाकी न सबको रोटी मिलेगी खारे पानी के सैलाब में से एक चुल्लू भर पानी भी न पी पायेंगे बस, रोक लो बर्बादी के कारवां को कुछ तो रहम मांगती है ज़मीन भी उस वक़्त की सोचो जब हमारे बच्चे इस ज़मीन पर रह भी ना पायेंगे

धर्म के नाम पे....

बन्दा कोई थकता नहीं ज़ुल्म करते करते, ज़ुल्म मगर खुद पे कौन सहता है , फितरत से शिकारी हैं सब लोग यहाँ , इसलिए शायाद बेज़ुबान डर के रहता है ... ये कुदरत भी चुपचाप देखती है लहू बहते के यहाँ रोज़ सड़कों पे खून बहता है, जिसमे आदमी अब तक भी जिंदा है, जाने वो इंसान कहाँ रहता है .... दरिया समंदर बाँट लिए लोगों ने इस ज़मीन पे लकीरें खींच दी ज़ंग जारी है हर मुल्क में के देखें अब आस्मां पे कौन रहता है ... बस कर अपनों को कत्ल करना के दर्द सबका जिस्म बराबर सहता है छोड़ दे उस मज़हब को जो , इंसान को इंसान से अलग होने को कहता है तोड़ दे उस शक को जो आजकल अपनों के दरमियाँ रहता है फिर किसी का घर न जला क्यूंकि हर घर में एक परिवार रहता है... मत तोड़ गरचे किसी के ख्वाब नफरत से बा-मुश्किल जो आँखों में टिका रहता है अरे बन्दे खौफ कर उस खुदा का जिसके नाम पे तू ये ज़ुल्म करता-ओ-सहता है

हर रोज़ एक नयी तलाश

यहाँ हर रोज़ एक नयी तलाश शुरू होती है, हर रोज़ एक नए सूरज की राह ताकी जाती है; सलीबों पे लटके बेशुमार मुर्दों में हर शाम, नोटों की गर्मी से जिंदगी फांकी जाती है; न कोई अपना है यहाँ पे न बेगाना इधर, हर शख्स की औकात सूरत से आंकी जाती है; इस भीड़ में गुमनामी भी एक ताज है के, आशनाई हो तो आदमी की रूह तक झांकी जाती है..

कल ज़रूर होगा

कल ज़रूर होगा.. मुझे यकीन है.. कल का आना तय शुदा तो नहीं मगर मुझे किस्मत पे यकीन है के मेरा आज जितना हसीन था मेरा कल उससे भी ज्यादा हसीन है ये मेरा हौसला है ओर ये ही मेरी जिद भी समझ लो के आसमानों को छूना है एक दिन चाहे अभी मेरे कदमो तले ज़मीन है वैसे न खौफ है मौत का हमे न इस जान से कोई लगाव है फिर क्यों सोचें कल के बारे में जब मेरा आज मेरे साथ यहीं है वक़्त सबको उतना ही मिलता है जितना लिखा हो लम्हा लम्हा खुदा की नवाजिश है फिर उसी खुदा पे छोड़ दे सब, सोच मत के इंसान के हाथ में कुछ नहीं है कल ज़रूर होगा.. मुझे यकीन है...