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Global Warming

इस बरस भी बारीश होगी इस साल भी बादल छायेंगे बूंदे तो उनके साथ होंगी लेकिन धरती के मौसम बदल जायेंगे ये कुदरत भी रो पड़ेगी और सारी इंसानियत आंसू बहायेगी जब सहरा तो सहरा रहेगा मगर जंगल भी सहरा बन जायेंगे इस हयात की ना पूछ ए दोस्त मेरे यहाँ ऑर हर कोहराम होगा जब दरख्तों पे परिंदे न होंगे और सारे पहाड़ पिघल जायेंगे हर तरफ दिन रात सिर्फ एक आग होगी, ओर होगी तिशनगी की एक इन्तहा हर रोज़ जब के काफिले निकलेगा ओर पानी को ढूँढने जायेंगे न दरिया कोई रहेगा बाकी न सबको रोटी मिलेगी खारे पानी के सैलाब में से एक चुल्लू भर पानी भी न पी पायेंगे बस, रोक लो बर्बादी के कारवां को कुछ तो रहम मांगती है ज़मीन भी उस वक़्त की सोचो जब हमारे बच्चे इस ज़मीन पर रह भी ना पायेंगे

मेहमान मौसम

ये ज़रूरी तो नहीं के मौसम को मेहमान बनाया जाए इस बरसती बारिश का अहसान जताया जाए गुपचुप बादल खुद भी बरसें हैं भीगे भीगे से फिर क्यूँ काली घटाओं से आँचल को सजाया जाए उसका आना तरबतर होकर एक छतरी से ढककर भी उसपर दुपट्टे से टपकता टिप टिप पानी गिरता हुआ गीले गीले बालों से आता खुशबू का झोंका ऐसे में इन हवाओं का, सच में, अहसान मनाया जाए हर बूँद में मस्ती सी भरी हुई हो शराब की हर छुअन में उसकी ताब हो आतिश भरा ऐसे में छज्जे के नीचे खडा हुआ में सोच रहा आज फिर सर पे छत को क्यूँ ओड़ाया जाए

उसका नशा

छलका के जो नज़रों से, मेरी जानिब देखा उसने हर मय का सुरूर कुछ फीका सा पड़ने लगा कैफ का काम करता था जो पैमाना मखमूर का तेरी आँखों की शराब में उसका नशा ढलने लगा **** इतनी बारिश में बिन छतरी के नंगे पावं छत पे वो आये लिल्लाह कैसे कैसे मेहनत-ए-पैहम किये मेरे एक दीदार को ***** हर रोज़ एक फूल भेजता है वो मुझे ख़त में लेकिन उसकी खुशबू ख़त ही चुरा लेता है मेरे दोस्त मगर तेरी भेजी तितलियों से ये दिल खेल कर खुद को बहला लेता है

एक दोस्त के लिए....रात भर के ख्याल...

मुझे सहर का न इंतज़ार है न तलाश है जिस रात तेरा ख्वाब मेरे पास है इन आँखों की गुस्ताखियों को बक्श दे के इनके लिए बस वो चेहरा ही कुछ ख़ास है ... जाने क्या दिल ढूँढता है, जाने इसको किसकी तलाश है मगर जो वो शख्स है, मेरे वजूद के आस पास है मेरी आँखों में शरारे बसते हैं के रात भर तेरे खवाब सवरतें हैं इस बरस भी बारिश आएगी , इस बरस भी बादल छायेंगे बूंदे तो उनके साथ होंगी लेकिन मौसम को दूर छोड़ आयेंगे उसके बिना सावन अधुरा रहेगा वो नहीं तो अब्र सूखा सा बहेगा उसके बिना आबशारी कम लगेगी प्यासे मन को वो भिगो ना पायेंगे आपकी नवाजिश है वरना हम क्या हैं बस, एक टूटा ख्वाब, एक टूटा पैमाना एक बिखरा ख्याल

आज कहने दो....

इस दिल में कितने अरमान मचलते हैं हर रोज़ हम कितनी बार तुमपे जीते हैं और तुम पर ही  तो रोज़ मरते हैं कितनी बार सांस लेते हैं याद नहीं जितनी बार भी मगर सांस लेते हैं हर सांस हर वक़्त तेरे नाम करते हैं न अहसास होता है सर्द हवाओं का न ही कभी गर्मी की लू सताती है तेरे नाम से बस  बारिश को याद करते हैं

बारिश के 3 रूप...

जब कभी बारिश होती है कच्ची मिट्टी की खुशबू संग लाती है हम इमारतों में बैठ कर लुत्फ़ उठाते हैं गरीबी टूटी झोपडी में बाल्टी लगाती है कही सूखा सूखा कच्चा फर्श भीग न जाए टपकते पानी में कहीं बह न जाए सारी जमा पूँजी इसलिए खुदा से बरसात बंद करने की दुहाई लगाती है गीला गीला घास का गलीचा, खिलते हुए फूल कुछ खुशनुमा जोड़े लड़के लड़कियों के बाग़ में पेड़ों के पीछे खडे हुए बरसात में बारिश किसी किसी के लिए प्यार की सौगात लाती है वहीं कभी फिसल गए कोई बाबू जी डगमगा के सौ सौ गालियाँ देते हैं मुनिसिपलिटी को कभी गड्दो में घुटने तक पानी में बचपन मासूमियत से कागज़ की कश्तियाँ तैराती है **** एक कप काफ़ी का मेरे सामने पड़ा है खट्टी मीठी इमली की चटनी पकोडे के साथ बस नही है तो तेरी मौजूदगी ओर मेरे हाथों में तेरा हाथ बारिश के इस मौसम में जाने क्यों आती है, बहुत आती है किसी अपने की याद दिल खाली है आँखें भरी हुई, आखिर कोई कैसे रोके ये मचलते हुए जज्बात **** गरम गरम चाय की चुस्की टिप टिप पड़ता पानी ओर ठंडी ठंडी हवाएं दिल चाहता है ओढ़ के इस बारिश को दूर कहीं इसमें खो जाएं ... बेलौस बरसता, टूटता आसमा काले बादल बिजलियाँ चम...

आंसू ....

वो आंसू क्या जो बह गए और दर्द का पैमाना छलक गया उस अश्क की कद्र कर ए दोस्त जो आँख किनारे रह गया सब्र और ज़बर की तपिश से आँख का पानी सुखा दे उस बादल का क्या वजूद जो बारिश बन के रह गया....

शुभ प्रभात

कुछ खिली खिली सी धूप है आज कुछ शबनम बिखर आई फूलों पे कुछ खुशबू सी उठी है साँसों में लगता है किसी ने मुड़ के देखा मुझे वो जो एक साया बनके गुज़रता था कभी कभी मेरे ख़्वाबों में तनहा सा, दूर खडा, चुपचाप लगता है उसी ने आज पुकारा मुझे

ख़ुशी भी उदास रहती है

खारे समंदर को भी मीठे पानी की प्यास रहती है सपनो को भी मासूम आँखों की तलाश रहती है ज़रूरी तो नही जिंदगी में हर मस्सर्रत शाद हो यहाँ कभी कभी ख़ुशी भी उदास रहती है सब कुछ मिल गया जो भी खुदा से माँगा आज तक फिर भी दिल को कुछ और पाने की आस रहती है जब भी उसको याद करते हैं तो लगता है के उसकी नज़र मेरी नज़र के पास रहती है ज़माना बीत जाता है उसका ख्याल आये हुए मगर आज भी दिल में उसकी आवाज़ रहती है

एक मुसलिफ की दास्तान

एक मुसलिफ की दास्तान सह गए दर्द ज़माने भर के भूख का दर्द सहा नहीं जाता बिलखते बच्चों का खाली पेट देखकर अब रहा नहीं जाता लिहाफ की गर्मी से क्या तन तापे जब मुफलिसी ही बदन ढाकें उधड़ रहा है जिस्म पैबंद के बीच गरीब बेटी से जवानी का बोझ सहा नहीं जाता नींद टकराकर आँखों से अक्सर लौट जाती है फिर से थककर टूटे ख्वाब बिखरे हैं जहाँ उससे वहाँ रहा नहीं जाता मेरे खेतों से होकर हवाएं आती हैं चूल्हे में पकती हुई रोटियों की खुशबू लाती हैं यहाँ राशन में मिले चावल से कंकंर और दाना चुना नहीं जाता दौलत कमाने को शहर आये थे कितने रिश्ते पीछे छोड़ आये थे हर चिठ्ठी में पुकार सुनाई देती है के किसी से भी गम-ए-जुदाई सहा नहीं जाता वो कुएँ का पानी वो गोबर के उपले वो आमों के झुरमुट के तले शाम ढले चले, लौट के गावं सोचते हैं, वैसे भी यहाँ पेट भरा नहीं जाता सह गए दर्द ज़माने भर के भूख का दर्द सहा नहीं जाता....

गुम हुआ सावन

हर वीराने को अंधेरों में तलाश-ए-चिराग नहीं होती बर्फ के लोग जहाँ मकीं हों दिलों मं आग नहीं होती शाद रहने की कोशिशों में मसरूफ हैं इस जहान वाले ग़मों के शौकीनों को मगर सुखों की फरियाद नहीं होती कब्र में दफ़न लाशों में मिलेंगे दफ़न कई अरमान यहाँ जिंदा इंसानों में ज़रूरत-ए-जज्बात नहीं होती मुफलिसी में पलती है कहीं हजारों जिंदगियाँ कहीं रईसों की भी दुनिया आबाद नहीं होती सूखे दरख्त उमीदों से तकते हैं उबलता आसमान सावन बरसे जब सहरा में तब भी यहाँ बरसात नहीं होंती

बीते पल

इक अनजान कमरे से उसने जब, मेरा तारुफ़ कराया था, उस अनजान कमरे में मुझे, मेरा अक्स नज़र आया था.... उसके बिस्तर से मुझे अपनी, खुशबू सी आई थी, और उसके तकिये ने मुझे मेरे नाम से बुलाया था.... उसकी सिलवटों से रिक्त चादर, मेरी उँगलियों को खुद छू गई थी, उसने मुझे उसकी जागी रातों के पल पल का हिसाब बताया था... न वो खिड़कियाँ मुझे जानती थी, न दर वो दीवारे मुझे पहचानती थी, फिर भी हर गोश ने मुझे, अपनेपन का अह्सास दिलाया था... इक तमन्ना पूरी हुई मेरी, यूँ अचानक खुदा मेहरबान हुआ, उसपे मेरी तमन्ना को उसने, हमारी तमन्ना कहके बुलाया था... वो बेशकीमती पल जिसमे, इक युग हमने बिताया था, मेरी साँसों में यूँ ढले जैसे, मेरे जीवन का उसमे सरमाया था... वो तीखी हवा और ठंडी दुपहरी, उन कम्प्कपाते हाथो की हरारत, और उसका छूना जैसे, बारिश में आफताब निकल आया था...

मेरा मौसम

तुम्हें सावन कहूं, बादल कहूं, या मौसम के हर नाम से तुम बारिश को बुलाते हो बारिश आये या न आये मगर उसकी हर बूँद में सिर्फ तुम नज़र आते हो ... अब्र छाते हैं जब आसमान पे काले तुम उनको बरसने को हर बार उकसाते हो अगर नहीं बरसते और यूँ ही चले जाते हैं तुम उनपे दिल्गिरियों का इल्जाम लगाते हो और अगर टूटकर छलक जाते हैं तो तुम और बारिश फिर एक हो जाते हो आख्रिश तुम बादल हो, सावन हो, मौसम हो तुम ही बारिश के खुदा नज़र आते हो ....