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Global Warming

इस बरस भी बारीश होगी इस साल भी बादल छायेंगे बूंदे तो उनके साथ होंगी लेकिन धरती के मौसम बदल जायेंगे ये कुदरत भी रो पड़ेगी और सारी इंसानियत आंसू बहायेगी जब सहरा तो सहरा रहेगा मगर जंगल भी सहरा बन जायेंगे इस हयात की ना पूछ ए दोस्त मेरे यहाँ ऑर हर कोहराम होगा जब दरख्तों पे परिंदे न होंगे और सारे पहाड़ पिघल जायेंगे हर तरफ दिन रात सिर्फ एक आग होगी, ओर होगी तिशनगी की एक इन्तहा हर रोज़ जब के काफिले निकलेगा ओर पानी को ढूँढने जायेंगे न दरिया कोई रहेगा बाकी न सबको रोटी मिलेगी खारे पानी के सैलाब में से एक चुल्लू भर पानी भी न पी पायेंगे बस, रोक लो बर्बादी के कारवां को कुछ तो रहम मांगती है ज़मीन भी उस वक़्त की सोचो जब हमारे बच्चे इस ज़मीन पर रह भी ना पायेंगे

कौल

ये नज़रें उस दुनिया का नज़ारा देखती हैं जिसमें अब देखने लायक नजारे ही नहीं... उनकी पहचान क्या होगी क्यूँ होगी भला जो कब से हमारे होकर भी हमारे ही नहीं **** तेरे कौल तेरे करार काफी हैं भरम पैदा करने को अब कसम देकर अपनी, फिर ईमान न बेईमान कर... मेरा नाम ले लेकर यूँ जो पुकारा करे हर दम ए हबीब मेरे आ सामने आ, यूँ दूर से परेशान न कर.. *** मेरे हबीब मेरी हस्ती क्या, कुछ नहीं ये नज़रे करम आपकी निगाहों का है ...

दोस्त

मेरी शाम की उदासी तेरी सुबह मिटाती है जब हर शब् मेरी याद तुझे याद कर सो जाती है ***** मौज हूँ, लेकिन मौज नहीं करती साहिल से के वो मेरा रहनुमा बनकर मुझे रोज़ ठुकराता है हर लहर को बुला कर वो बेदर्द सागर करीं बड़ी बेशर्मी से सभी की सीपियाँ चुराता है ***** इतनी उम्मीद रखी उस नामुराद ने मुझ बेगानी से खुद पे शरमनिसार हुई जब नाउम्मीद, मेरे दर से वो गया ****** उसका रकीब बनने से पहले खुदाया समझ लेना वो एक चारागर है, और तुम हो एक बीमार दोस्ती रखोगे तो मिजाज़ पुरसी को आयेंगे वरना कौन यहाँ किसका होता है तीमारदार ???

महफिल

आपकी दुआओं की नवाजिश यूँ ही चलती रहे ये आँखें क्या सारी कायनात दुरुस्त हो जायेगी जब जब इस नाचीज़ से दर्द मुकाबिल होगा कभी सिर्फ आपकी ही दुआ तब मेरे काम आएगी ************* तेरे नशे में चूर चूर हुए बैठे हैं महफिल में तेरी खुद को क्या, यहाँ खुदा तक को होश नहीं इतना सुरूर है तेरी बातों मे ए जान नशीं के पैमाने भरे रखे हैं उठाने का जोश नहीं ************** ये हसरत ही रह गयी के उनकी महफिल मे एक जाम उठाते मुझ तक आते आते मय बची नहीं और साकी रुक्सत हो गया...

मुजस्मा

उनका मुजस्मा मेरे ज़हन में इस कदर छाया हुआ है के हर रंग मोहब्बत के बेहतरीन रंगों से नहाया हुआ है वो कहते हैं के दूर हो जाएँ हम उनसे, बहुत दूर मगर यहाँ एक चेहरा मासूम सा इन नज़रों में समाया हुआ है **** आपकी खामोशी की आवाज़ तहेदिल तक पहुँच गयी अब तक एक गूँज अरमान जगह रही है बेलौस.... *** ये हारने ये जीतने की बातें नागवार हैं मुझे जिंदगी की जंग में किसको क्या हासिल हुआ जो जीत गया दिलों को खुद का दिल हार कर तुम्हीं बताओ वो किस ईनाम के काबिल हुआ हर रहगुज़र पे बिछे हैं बेशुमार खार यहाँ, और हर शख्स खुद के अरमानो का कातिल हुआ मुझको आइना दिखाकर अपनी सुरत छुपा ली मेरे लिए अब तू गुनाहगारों की कतार में शामिल हुआ

उनका गिला

कुछ बूँदें बारिश की उधार मांग लो आज ही मेरे छज्जे पे इबके बहुत सावन बरसा है कई मोर ढूंढते हैं नाचने को घटा काली और लैला का दिल बारिश में मजनू को तरसा है ************* उनका गिला के हम दूरियां बढाने लगे हैं उनको शिकवा के हम मुहं छुपाने लगे हैं हम पर्दानशीं हैं शरमसार नहीं, क्या हक उन्हें, जो हम पर यूँ इल्जाम लगाने लगे हैं ***** आपकी हर बात पे मर जाने को जी करता है आपकी हर बात जीने का सबब भी है लेकिन ... ****** कई रास्तों से गुज़र कर तेरी अंजुमन में तशरीफ़ लाये हैं एक जाम मेरे महबूब के नाम साकी महफ़िल को पिला देख किस कदर खामोश बैठे हैं सब बादाकशीं सर झुकाए उठाकर अपना पैमाना भी उसके नाम से आ ज़रा नजदीक आ ********** तुझको मेरी रुसवाई का वास्ता है, आ एक बार फिर मुझे बदनाम कर आ एक बार फिर मेरे करीब आ आ एक बार फिर मेरे कत्लेआम कर ... ******** खुदी को कर बुलंद इतना के हर नज़र तेरी जानिब उठे बा-हौसला और झुका कर सर अपना कबूल तू हर ख़ास-ओ-आम का सजदा

Best wishes to u

हर ज़र्रा रौशनी का आपको दिया हर लम्हा ख़ुशी का आपके नाम किया दुआओं का सिलसिला यूं ही चलता रहे तहे दिल से ये आपके दिल को पैगाम दिया हाँ, मिल नहीं सकते इसका रंज है इसलिए फासलों से सलाम आपको किया गर जिंदगी रहे तो इंशाल्लाह एक दिन आपसे मिलने का वादा सरे-आम किया

करार न था

बाट देखें भी तो कब तक कोई आने का करार न था बैठें हैं राह में के कहीं वो ये न कहे आज मेरा इंतज़ार न था सुबह से शाम हो गयी और शाम अब रात में तब्दील हुई जाती है सोये जब आँखों में नींद तो थी गरचे नींद का खुमार न था उफक के सभी अख्तर बेसब्र हुए जाते हैं बेचारे तुम्हारी चाहतों में क्यूँकर उनका शुमार न था

बस यूँ ही

क्यूँ वक़्त के मोहताज हैं, क्यूँ किस्मत पे तुम्हें नाज़ है क्या नहीं किया तुम न सोचो, क्या किया जिसपे ज़माने को ऐतराज़ है **** लफ्ज़ नहीं मिलते जज़्बात नहीं मिलते दिल नहीं मिलते खयालात नहीं मिलते नफरत करना आसान है इस जहां में मुहब्बत करने के आजकल हालात् नहीं मिलते ***** एक दाद सुनने को हमने दीवान लिख डाले अब ये बेनूर आँखें चिरागां हुई जाती हैं ***** सिर्फ एक चेहरा होता तो सिमट सकता था ख़्वाबों में यहाँ हर किसी के चेहरे पे कई मुखौटे लगे रहते हैं परत दर परत खुरच के देखा भी यारों हमने हर सुहानी सूरत के पीछे डरावने जज़्बात पड़े रहते हैं

एक आम आदमी

हर कमान आज खाली है तेरे तीर से खामोशी बंध नहीं सकती ज़ंजीर से रोक नहीं सकते वक़्त-ए-गर्दिशी को क्या लडेगा कोई भला तकदीर से जंग जारी है ज़माने भर में आज हर तरफ इल्जाम हैं संगीन से मौत की ख्वाइश न कर बाशिंदे तू मौत भी यहाँ मिलती है तकदीर से ...

ज़िन्दगी

ज़िन्दगी एक किताब नही जिसे पड़ लिया और ख़तम हो गई... ज़िन्दगी एक पुलिंदा है कोरे कागजों का, जिसका हर पन्ना एक हिकायत का हक़दार है.... इसे जी भर के जियो और अपने तजुर्बे इस पर लिखो.... फिर वोह चाहे अच्छे हो या बुरे.... keep smiling... smiling thru tears make ur eyes glisten like diamonds.... आपकी बातों को फासलों से गुज़र जाने की आदत है कोई इंतज़ार करे तो किया करे, खैर आपकी बला से

मेरी हिना

मेरी नादानियों को मेहरबानी समझी या खुदा कितना नासमझ वो शक्स था बहुत देर तकता रहा जिस पर्दानशीं को उस नकाब के पीछे मेरा ही अक्स था रिन्दों की बज्म में बैठा बिन पीये क्यों क्या कशिश रक्कासा का रक्स था ? मेरी हिना को अपनी हथेली पे सजाता बड़ा ही अजीब आशिक वो शक्स था ....

मेहमान मौसम

ये ज़रूरी तो नहीं के मौसम को मेहमान बनाया जाए इस बरसती बारिश का अहसान जताया जाए गुपचुप बादल खुद भी बरसें हैं भीगे भीगे से फिर क्यूँ काली घटाओं से आँचल को सजाया जाए उसका आना तरबतर होकर एक छतरी से ढककर भी उसपर दुपट्टे से टपकता टिप टिप पानी गिरता हुआ गीले गीले बालों से आता खुशबू का झोंका ऐसे में इन हवाओं का, सच में, अहसान मनाया जाए हर बूँद में मस्ती सी भरी हुई हो शराब की हर छुअन में उसकी ताब हो आतिश भरा ऐसे में छज्जे के नीचे खडा हुआ में सोच रहा आज फिर सर पे छत को क्यूँ ओड़ाया जाए

JAGRAN

कब तक और कब तक फसले-गुल के मौसम में गोलियां उगायेंगे? पड़ोसी मुल्क के बाशिंदे हमारा कितना लहू बहायेंगे? और हमारे देश के लोग कब होश में आयेंगे? शहीदों की मौत पर कब नकली नेता सच्चे आंसू बहायेंगे? सचमुच जिंदगी इतनी सस्ती है कब हम इसके सही मोल लगायेंगे? जगाया उसको जाता है जो सोया होता है जागे हुओं को कितने बम्ब जगायेंगे? बस, अब हद से बाहर हो गया बर्दाश्त भी और नहीं होता और कितने दंगों के बाद हम हिन्दुस्तानी गनीम-ए-शहर में आतिश्बारी करवाएंगे? शर्म औरत का गहना होती है लगता है अब आदमी उसको अपनाएंगे और चूड़ियाँ पहनने वाले हाथ आखिरकार बंदूकें उठाएंगे... गर बुरा लगा तो बुरा मान लो और हिम्मत-ए-मर्दा-मदद-ए-खुदा जान लो उठा लो तलवार बाँध के कफ़न चलो यूँ ही सही उकसा कर हम अपने लोगों को बहादुर बनायेंगे... बहुत झुक लिया, बहुत सह लिया अब और नहीं सह पायेंगे आज प्रण करो...खुद से हम अपने देश को इस आतंक इन आतंकवादियों से बचायेंगे! गनीम-ए-शहर - दुश्मन देश

For the soilders/policemen who lost their lives fighting terrorism in mumbai...26/11/2008

समेट कर आग सीने में जब वो घर से निकला होगा आग बुझाने को कितने आईने देखें होंगे अपनों के अक्सों को आँखों में छुपाने को रात में नीदों का साया फिर नहीं आएगा उसके मकां पे वो अपना आशियाना छोड़ कर गया था औरों के घर बचाने को तान के बन्दूक जा खड़ा हुआ बन्दूक के आगे शेर दिल लौटा नहीं जिंदा, तो क्या फौजी बना ही था मुल्क पे मर जाने को कुछ सरकारी तमगे मिलें और मिला कुछ लाख का मुआवज़ा अब सलाम करें या शहादत का नाम दें के वो मरा देश बचाने को किसके साथ क्या हुआ कौन मरा कौन बचा और फिर वो ही मुक्कदमा इन्साफ की मत पूछो, के इन्साफ यहाँ का है सिर्फ खिल्ली उडाने को उस मुल्क पे ओड़ के गुनाहों का सारा इल्जाम अपना गिरेबां झाड़ लिया इस मुल्क का नेता जीता है मासूमों के लहू से अपनी प्यास बुझाने को

कुसूर

हद है,कुसूर भी माना उन्होंने कुछ अकड़ के कुछ बिगड़ के .... ***** कोई दर्द में हुआ हो तो हुआ करे उन्हें अपनी बेपरवाही पे गुरुर है देख कर एक नज़र उधर देखते हैं जाने उधर किस शय में क्या सुरूर है ??? ****** हर बात पे तोहमत लगाते हैं हर बात पे टोकते जाते हैं मेरे हबीब हैं वो खुदाया फिर क्योंकर दुश्मनी निभाते हैं ? ***** मेरे चाहनेवालों की फेहरिस्त में आज फिर एक नाम जुड़ गया उनकी आशिकी का दम भरते थे कभी आज वो दामन फैलाए खड़े हैं

रात की बातें

बस थक गए अब तेरे ख़त के इंतज़ार में कुसूर तेरा या नामाबर का अल्लाह जाने... ****** आपकी दोस्ती सर आँखों पे ए दोस्त मेरे यहाँ लोग कम हैं जो यूँ फ़र्ज़ निभातें हैं इन्तेहा-ए-जुर्म खुद करते हैं ज़माने भर में हम बेकसूरों पे सरेआम इल्जाम लगाते हैं **** तेरी रुसवाइयों के सदके मेरी बदनामियाँ हुई अब खौफज़दा तू क्यूँकर होता है दीवाने मेरे ... ****** हर लफ्ज़ में एक ही बात कहे जाते हैं वो बस शिकायत, और शिकायत, एक और शिकायत **** अब रात की बातें रातों पे छोड़ कर लो हम चल पड़े एक सुबह की तलाश में...

Bihar: बिहार की त्रसिदी को समर्पित ....

पानी के थपेडो में तूफान के अंधेरों में नाखुदा का इंतजार करती कितनी बेफरियाद है ये जिंदगी कुछ बेजार सी लगती है कुछ नाराज़ सी लगती है, अपनी तो है लेकिन बड़ी बरबाद है ये जिंदगी दुओं की आदत नहीं अजाब से खौफ नहीं बिन उम्मीद की बेहद नामुराद है ये जिंदगी हर रोज दिन से शुरू होकर हर रात यूँ ही सो जाती है क्या उस दुनिया में सबकी यूँ बेबुनियाद है ये जिंदगी हरसूं एक शोर है हरसूं एक सन्नाटा भी गूंगी बहरी लेकिन जिन्दा क्यूँ इतनी बेजार है ये जिंदगी सैलाब एक नाशादियों का भूख का बरबादियों का गहरे-उथले पानी में कैसे आबाद है ये जिंदगी एक उम्मीद बाकि है कहीं तो इंसानियत जागी है जोश -ए-जूनून की लेकिन क्यूँ मोहताज है ये जिंदगी कुछ रुकी रुकी सी कुछ थमी थमी सी एक नयी सुबह की करती इजाद है ये जिंदगी

सब्र

सब्र की मियाद ख़तम होने को है शायद कहीं से रुक्सती का एक पैगाम आया है राहों में दरख्त फिर से हरे हो गए अब, के एक हवा का झोंका उनके आने का संदेस लाया है ***** यादें शब् भर शम्मा बन जाने की ख्वाइश रखती हैं एक परवाना ही नहीं मिलता जो खुद जला सके ****** इस कदर उसने इतरा के मेरी तारीफ़ की एक दिन हर हर्फ़ मेरे सफ्हे का मुक्कम्मल हो गया ***** इस रंगत की शोखियों पर उनकी नज़रों की शरारत एक घड़ी में एक जिंदगी बिता दी यूँ ही तकते तकते ...

इरतिका-ए-जिंदगी

तुम कहते हो सुनो, दर्द उनकी सिसकियों का मैं कहती हूँ, मैंने देखा ज़ख्म जहाँ थे उस देश के लोगों को गवांरा था यूँ घुट के मरना उस देश की लोगों में लड़ने के हालात कहाँ थे हर सरकार लूटती थी हर शहर हर गली को उनके आगे चंद लोगों के नाल-ए-फरीयाद रवां थे फिर भी पत्थर कूटते उन हाथों में हर वक़्त मुल्क की इरतिका-ए-जिंदगी के अरमान जवां थे इरतिका-ए-जिंदगी - progress of life