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कौल

ये नज़रें उस दुनिया का नज़ारा देखती हैं जिसमें अब देखने लायक नजारे ही नहीं... उनकी पहचान क्या होगी क्यूँ होगी भला जो कब से हमारे होकर भी हमारे ही नहीं **** तेरे कौल तेरे करार काफी हैं भरम पैदा करने को अब कसम देकर अपनी, फिर ईमान न बेईमान कर... मेरा नाम ले लेकर यूँ जो पुकारा करे हर दम ए हबीब मेरे आ सामने आ, यूँ दूर से परेशान न कर.. *** मेरे हबीब मेरी हस्ती क्या, कुछ नहीं ये नज़रे करम आपकी निगाहों का है ...

दोस्त

मेरी शाम की उदासी तेरी सुबह मिटाती है जब हर शब् मेरी याद तुझे याद कर सो जाती है ***** मौज हूँ, लेकिन मौज नहीं करती साहिल से के वो मेरा रहनुमा बनकर मुझे रोज़ ठुकराता है हर लहर को बुला कर वो बेदर्द सागर करीं बड़ी बेशर्मी से सभी की सीपियाँ चुराता है ***** इतनी उम्मीद रखी उस नामुराद ने मुझ बेगानी से खुद पे शरमनिसार हुई जब नाउम्मीद, मेरे दर से वो गया ****** उसका रकीब बनने से पहले खुदाया समझ लेना वो एक चारागर है, और तुम हो एक बीमार दोस्ती रखोगे तो मिजाज़ पुरसी को आयेंगे वरना कौन यहाँ किसका होता है तीमारदार ???

महफिल

आपकी दुआओं की नवाजिश यूँ ही चलती रहे ये आँखें क्या सारी कायनात दुरुस्त हो जायेगी जब जब इस नाचीज़ से दर्द मुकाबिल होगा कभी सिर्फ आपकी ही दुआ तब मेरे काम आएगी ************* तेरे नशे में चूर चूर हुए बैठे हैं महफिल में तेरी खुद को क्या, यहाँ खुदा तक को होश नहीं इतना सुरूर है तेरी बातों मे ए जान नशीं के पैमाने भरे रखे हैं उठाने का जोश नहीं ************** ये हसरत ही रह गयी के उनकी महफिल मे एक जाम उठाते मुझ तक आते आते मय बची नहीं और साकी रुक्सत हो गया...

मुजस्मा

उनका मुजस्मा मेरे ज़हन में इस कदर छाया हुआ है के हर रंग मोहब्बत के बेहतरीन रंगों से नहाया हुआ है वो कहते हैं के दूर हो जाएँ हम उनसे, बहुत दूर मगर यहाँ एक चेहरा मासूम सा इन नज़रों में समाया हुआ है **** आपकी खामोशी की आवाज़ तहेदिल तक पहुँच गयी अब तक एक गूँज अरमान जगह रही है बेलौस.... *** ये हारने ये जीतने की बातें नागवार हैं मुझे जिंदगी की जंग में किसको क्या हासिल हुआ जो जीत गया दिलों को खुद का दिल हार कर तुम्हीं बताओ वो किस ईनाम के काबिल हुआ हर रहगुज़र पे बिछे हैं बेशुमार खार यहाँ, और हर शख्स खुद के अरमानो का कातिल हुआ मुझको आइना दिखाकर अपनी सुरत छुपा ली मेरे लिए अब तू गुनाहगारों की कतार में शामिल हुआ

उनका गिला

कुछ बूँदें बारिश की उधार मांग लो आज ही मेरे छज्जे पे इबके बहुत सावन बरसा है कई मोर ढूंढते हैं नाचने को घटा काली और लैला का दिल बारिश में मजनू को तरसा है ************* उनका गिला के हम दूरियां बढाने लगे हैं उनको शिकवा के हम मुहं छुपाने लगे हैं हम पर्दानशीं हैं शरमसार नहीं, क्या हक उन्हें, जो हम पर यूँ इल्जाम लगाने लगे हैं ***** आपकी हर बात पे मर जाने को जी करता है आपकी हर बात जीने का सबब भी है लेकिन ... ****** कई रास्तों से गुज़र कर तेरी अंजुमन में तशरीफ़ लाये हैं एक जाम मेरे महबूब के नाम साकी महफ़िल को पिला देख किस कदर खामोश बैठे हैं सब बादाकशीं सर झुकाए उठाकर अपना पैमाना भी उसके नाम से आ ज़रा नजदीक आ ********** तुझको मेरी रुसवाई का वास्ता है, आ एक बार फिर मुझे बदनाम कर आ एक बार फिर मेरे करीब आ आ एक बार फिर मेरे कत्लेआम कर ... ******** खुदी को कर बुलंद इतना के हर नज़र तेरी जानिब उठे बा-हौसला और झुका कर सर अपना कबूल तू हर ख़ास-ओ-आम का सजदा

कुसूर

हद है,कुसूर भी माना उन्होंने कुछ अकड़ के कुछ बिगड़ के .... ***** कोई दर्द में हुआ हो तो हुआ करे उन्हें अपनी बेपरवाही पे गुरुर है देख कर एक नज़र उधर देखते हैं जाने उधर किस शय में क्या सुरूर है ??? ****** हर बात पे तोहमत लगाते हैं हर बात पे टोकते जाते हैं मेरे हबीब हैं वो खुदाया फिर क्योंकर दुश्मनी निभाते हैं ? ***** मेरे चाहनेवालों की फेहरिस्त में आज फिर एक नाम जुड़ गया उनकी आशिकी का दम भरते थे कभी आज वो दामन फैलाए खड़े हैं

रात की बातें

बस थक गए अब तेरे ख़त के इंतज़ार में कुसूर तेरा या नामाबर का अल्लाह जाने... ****** आपकी दोस्ती सर आँखों पे ए दोस्त मेरे यहाँ लोग कम हैं जो यूँ फ़र्ज़ निभातें हैं इन्तेहा-ए-जुर्म खुद करते हैं ज़माने भर में हम बेकसूरों पे सरेआम इल्जाम लगाते हैं **** तेरी रुसवाइयों के सदके मेरी बदनामियाँ हुई अब खौफज़दा तू क्यूँकर होता है दीवाने मेरे ... ****** हर लफ्ज़ में एक ही बात कहे जाते हैं वो बस शिकायत, और शिकायत, एक और शिकायत **** अब रात की बातें रातों पे छोड़ कर लो हम चल पड़े एक सुबह की तलाश में...

सुबहों में मेरा बसेरा है

मेरे ख़्वाबों की ज़मीं ला-महदूद है हर शख्स का इधर बसेरा है यहाँ एक ख्वाब अनजाना सा है और एक ख्वाब सिर्फ मेरा है उनकी हस्ती को भुला दिया जो हर तोहफा ज़ख्मो भरा देते थे अब रातों से मुझे क्या काम जब सुबहों में मेरा बसेरा है ****** सद कोशिशें की उनसे दूर जाने की हर गाम पे यूँ लगा फिर आवाज़ लगाई...

Just.....

मस्त हैं हम जहां की मस्तियों में डूब कर कौन है भला जो हमसे निजात पा सके... कोशिशें लाख करते हैं ज़माने वाले रोज़ ब रोज़ ना किसी में दम नहीं जो हमारे नज़दीक आ सके ... **** हद है के वो उल्फत को अहसान समझ बैठे काली स्याह अब्र को आसमान समझ बैठे मेरी आवाज़ घायल थी दर्द के ज़ख्मों से उनकी नवाजिश थी के वो उसे आजान समझ बैठे *** यादों का काम है तड़पना और तडपाना इस नामाकूल से कौन कमबख्त ऐंठता है ....

मुझे आजाद कर दो...

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न इजहार तू कर न इकरार तू कर मैं एक आजाद पखेरू हूँ मुझे आजाद तू कर मेरी खुशबू, तेरी नहीं मेरी आरजू, तेरी नहीं मैं एक हवा का झोंका हूँ मैं बहूँ, आगाज़ तू कर

ज़रा सोचो...

किन किनारों की बात करते हैं जनाब जहाँ लहरें दम तोड़ती हैं जहाँ किश्तियाँ सागर तोलती हैं जहाँ खारे पानी का एक सैलाब आता है जहाँ हर पेड़ मुरझा जाता है दर्द की शिद्दत किनारा नहीं बताता है दर्द हमेशा समंदर अपने दिल में छुपाता है बात करो जब चोट की तो, सफीने से पूछो जिसको किनारा छोड़ देता है और समंदर सँभाल नहीं पाता है

गुस्से में..

तुम करो गलती तो वो मज़ाक बन गयी हम करें मज़ाक तो वो गुनाह में शामिल हो गया हमको दी सज़ा और सज़ा हमने कबूल की आपसे की शिकायत तो दिल आपका घायल हो गया

लेकिन पानी में दिल वाले ही उतरते हैं

किसी को तैरना आता है, कोई डूब जाता है लेकिन पानी में दिलवाले ही उतरते हैं दरया सरमाया उसको देता है जो चीरते हैं लहरों को वो मोती नहीं पाते जो सागर से डरते हैं... दोस्त दोस्त तेरी दोस्ती पे ये दिल-ओ-जान कुर्बान है इस जबीं के वास्ते अर्श तेरा ही मकान है सजदा करें या फना हो जाएं कैसे खुद को लुटाएं ये सोच के हैरान हैं ख्वाब बुलाते हैं कल फिर तुम्हें मेरे ख्वाब बुलाते रहे तुमको मेहमान बनाने का इरादा था न तुम आये न कोई पैगाम आया मगर लुफ्त उस इंतज़ार में वसल से ज्यादा था ... *** तेरा एक ख्याल जगाता रहा सिर्फ एक रात की बात होती तो सह लेते, यहाँ कई रातों का यु ही सिलसिला रहा तेरा एक ख्वाब सुलाता रहा तेरा एक ख्याल जगाता रहा ....

मैं माज़ी का सोचूँ

मैं माज़ी का सोचूँ, या सोचूँ आज का मौज़ू हर एहद में गुलों से बस कुछ ख्वार ही नसीब हुए मेरी बुरी आदतें मेरी जिंदगी का सिला हैं कभी जिंदगी गम के, कभी गम जिंदगी के करीब हुए

कुछ बिखरे से ख़्याल....

वो शायर क्या जो दिल की बात लफ्जों में न पिरोये वो शायर क्या जो ज़ख्म-ए- दिल को लहू से न धोये उस शायर का होना बेमानी है जो दर्द-ए-बयानी न कर सके वो शायर क्या जिसके शेर दामन को आंसुओं से न भिगोए *** हमारे नशे का सबब कोई शख्स नही हमे तो खुद का नशा रहता है हुजुर हम खुद पे ही करम फरमातें हैं हर रोज़ हमे खुद पे ही है बेलौस गुरूर .... *** हर राह तेरी तरफ नही जाती, मगर तुझसे होकर गुज़रती क्यों है के तू मंजिल नही हमसफ़र भी नही, रास्ता भी नही रहबर भी नही *** कभी वक़्त मिले तो हमपे भी अहसान फरमाना ... ज्यादा नहीं थोड़ी देर के लिए यहाँ भी चले आना *** तेरे बारे में सोचते है शब भर, दिन तेरे ख्यालों में बिताते हैं, इक लम्हा बस पहलू में मिल जाये तेरे, इसी ख्वाइश में जिए जाते हैं.... *** हर राह तेरी तरफ नही जाती, मगर तुझसे होकर गुज़रती क्यों है के तू मंजिल नही हमसफ़र भी नही, रास्ता भी नही रहबर भी नही *** दिल से जब लिखोगे ए दोस्त मेरे खून निकलेगा कलम से स्याही नहीं वो शायरी क्या जो नशे में लिखी गयी वो नज़म क्या जो आंसुओं से नहाई नही

मयस्सर

इजतिराब का गुमा है या दिल वाकई बर्गश्ता है, के मेरा मुहाफिज़ कम्बखत एक ज़हर निकला; फरेब दिल को हुआ या शुबा फरेब का था, एक मोहसिन था, जाहिद था, अब बेखबर निकला; कोसना मेरी फितरत नहीं. दुआ उसको भायी नहीं, मेरा हर लफ्ज़ हाय कितना बेअसर निकला; फासलों से दिखाई दिया बहुत पराया था, नजदीकियों से वो कितना मयस्सर निकला..