वो शायर क्या जो दिल की बात लफ्जों में न पिरोये वो शायर क्या जो ज़ख्म-ए- दिल को लहू से न धोये उस शायर का होना बेमानी है जो दर्द-ए-बयानी न कर सके वो शायर क्या जिसके शेर दामन को आंसुओं से न भिगोए *** हमारे नशे का सबब कोई शख्स नही हमे तो खुद का नशा रहता है हुजुर हम खुद पे ही करम फरमातें हैं हर रोज़ हमे खुद पे ही है बेलौस गुरूर .... *** हर राह तेरी तरफ नही जाती, मगर तुझसे होकर गुज़रती क्यों है के तू मंजिल नही हमसफ़र भी नही, रास्ता भी नही रहबर भी नही *** कभी वक़्त मिले तो हमपे भी अहसान फरमाना ... ज्यादा नहीं थोड़ी देर के लिए यहाँ भी चले आना *** तेरे बारे में सोचते है शब भर, दिन तेरे ख्यालों में बिताते हैं, इक लम्हा बस पहलू में मिल जाये तेरे, इसी ख्वाइश में जिए जाते हैं.... *** हर राह तेरी तरफ नही जाती, मगर तुझसे होकर गुज़रती क्यों है के तू मंजिल नही हमसफ़र भी नही, रास्ता भी नही रहबर भी नही *** दिल से जब लिखोगे ए दोस्त मेरे खून निकलेगा कलम से स्याही नहीं वो शायरी क्या जो नशे में लिखी गयी वो नज़म क्या जो आंसुओं से नहाई नही