मेरी हिना

मेरी नादानियों को मेहरबानी समझी
या खुदा कितना नासमझ वो शक्स था
बहुत देर तकता रहा जिस पर्दानशीं को
उस नकाब के पीछे मेरा ही अक्स था
रिन्दों की बज्म में बैठा बिन पीये क्यों
क्या कशिश रक्कासा का रक्स था ?
मेरी हिना को अपनी हथेली पे सजाता
बड़ा ही अजीब आशिक वो शक्स था ....

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