एक तोहफा देने का वादा किया था तुमने कभी अब कहते हो रिश्तों के साथ दस्तूर बदल गया
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लम्हें
कभी आँखों पे तकिया, कभी गलों पे शूल. कभी आगोश में गुम कभी लबों पे फूल ऐसा वक़्त भी कोई भुला सकता है, क्या कोई किसी को इतना याद आ सकता है? कभी हथेलियाँ टकराई, कभी साँसे कस्मसाई, कभी आँखे शरमाई, कभी उंगलियाँ कम्पकंपाई , ये समां भला कोई दोहरा सकता है.. क्या कोई किसी को इतना याद आ सकता है? कभी जिस्म गुदगुदाये, कभी होंठ थर्राए, कभी नज़रें मिलाये, कभी फिर नज़र झुक जाये, इन लम्हों को कैसे समेटा जा सकता है, क्या कोई किसी को इतना याद आ सकता है? कभी कन्धों को छूना कभी लगे पहलू सूना, कभी नजदीकियां इतनी, के महक उठे पसीना सोचते हैं कैसे उन्हें फिर बुलाया जा सकता है क्या कोई किसी को इतना याद आ सकता है?
फरिश्तों के साथ वक़्त क्या गुज़ारा दुरुस्त सारा बदरंग नज़ारा हो गया दिल ज़ाकिर जो हुआ, सो हुआ खैर वो मोहसिन खुदा का हमारा हो गया ... farishta - angel durust - positive badrang - negative zaakir - grateful khair - but mohsin - angel i spent some time with an angel and my negativity turned into positive energy. my heart is grateful to god for sending that angel to me...