Friday 18 November 2011

बहुत देता है, दामन भरता नहीं फिर भी,
न भूख मिटती है, न प्यास जाती है,
तेरे दर पर रहमतों की बारिश ऐसी है
के हर टूटे दिल को इस दर उसकी आस लाती है...

जिसने कभी सर झुकाया नहीं, उसको भी यकीं है
के माथे की लकीरें तेरी कलम से लिखीं हैं
जिसका सर कभी उठा नहीं तेरी चौखट से,
सुना है तेरी खुदाई खुद उसके पास जाती है ...

मेरा क्या, मेरी ज़बीं किसी के दर पर नवीं नहीं
मेरी जुबां ने तेरा नाम शायद कभी लिया नहीं
आज जब हाथ उठे दुआ को बेकसी में,
तेरी नूर-ए-नज़र की कशिश मुझे तेरे पास लाती है...

वो आँख का चुल्लू भर पानी यूँ दरिया नजीब बन गया
तेरी नज़र-ए-इनायत पड़ी और मेरा नसीब बन गया
नाकाफी थी मेरी झोली मौला, ऐसी बख्शीश दराज़ की
वल्लाह हम काफिरों पर भी तेरी नज़र ख़ास जाती है ...

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