Thursday 30 October 2008

तो कोई बात है

छोड़ के नफरत मेरी करीब आओ तो कोई बात है
भूल कर ग़मों को मुस्कुराओ तो कोई बात है
धूप में तो सब गुज़ारा कर ही लेते हैं मर खप कर
तूफानी गलां में जी कर दिखाओ तो कोई बात है
फिरदोस है जन्नत है इसमें किसको शक भला
हाँ, दोज़ख में खुशियाँ बिछाओ तो कोई बात है
दरिया में उतरते हैं तो पार लग ही जाते हैं
डूब कर सागर करीं आ जाओ तो कोई बात है
हर एक शख्स अपनी असीरी में सदियों से कैद है
दुश्मनों की जंजीरें तोड़ आओ तो कोई बात है
फूल हैं तो महकेंगे ही के उनकी ये ही फितरत है
सहरा में गुलशन को बसाओ तो कोई बात है

Monday 27 October 2008

सब तकदीरों की कहानियां ऐसी नहीं होती

न हिज्र का गिला
न वस्ल की इल्तजा
सब रिश्तों की बुनियाद
ऐसी नहीं होती....

आगोश में जन्नत हो
या दूरियों में दोज़ख
हर मोहब्बत की इन्तहा
ऐसी नहीं होती...

नज़र-नज़र में गुफ्तगू
सरे आम या तन्हाई में
सबकी चाहत- ए- बयान
ऐसी नहीं होती...

रुसवाइयां नीवं हो जिसकी
बदनाम करें महबूब को
चाहत-ए पाकीज़ की निशानियाँ
ऐसी नहीं होती...

परवान चढ़ जाए जो मोहब्बत
और खुशगवार भी हो
सब तकदीरों की कहानियां
ऐसी नहीं होती....

Friday 24 October 2008

वो शख्स

रंग भरा उम्मीदों भरा,
हर रोज़ मुझसे मिलने
रात गए मेरे ख्यालों में आता है,
क्या बताएं वो कैसा है,
बिलकुल ख्यालों जैसा है,
मुझे अक्सर इंतज़ार और उम्मीदों में,
फर्क समझाता है,
जिसके होठों में इक आग है,
जिसकी सांसो में इक राग है,
सभी साज ज़िन्दगी के बज उठते हैं,
जब वो नजदीक आता है,
कुछ कल के किस्से ,
कुछ आज के अफसाने,
मेरे आज से जुड़ कर,
कैसे कैसे बहानों से,
गीतों में सुनाता है,
जिसके होने से बहार आती है,
जिसके जाने पे खिजां सताती है,
बादल सावन उसमे समाये,
जो खुद को मौसम,
मुझे बारिश बुलाता है,
जिसकी छाव में तपिश
जिसके आगोश में आतिश,
जो तन्हाई में अक्सर,
उँगलियों से अपनी धड़कन सुनाता है,
जो ख्वाबीदा होकर भी,
सपनो से डराता है,
अपने लिए सिर्फ हकीकत चुनता है,
मुझे मगर गए रात सपने दिखाता है,
जिसके लबों पर मेरा नाम तक नहीं आता,
बिना नाम के वो अपने नामों से
मुझे अक्सर बुलाता है,
दिन भर इधर उधर भवरे सा
सब फूलों पर डोलता
रात में वो सिर्फ मेरा हो जाता है,
पता नहीं और कुछ नहीं,
दो लफ्जों की उसकी जुबान,
जिसके दर्मियान
मुझे वो हिकायते-जिंदगी सुनाता है,
आप और तुम के हमारे फासले,
शायद कभी कम न हो
इन फासलों के बीच से निकलकर,
वो शख्स रात गए मेरे ख्यालों में आता है,
वो आदतन सबके आंसू चुनता है,
और उन आसुओं पे मुस्कुराते बुनता है,
फिर उन्हें होठों पे सजाता है,
जिसकी आँखें बोलती हैं,
नए पुराने राज खोलती है,
जिन्हें वो कब से छुपाये था
अब हर वक़्त सुनाता है,
जिसका अंदाजे बयां निराला है,
उलझाने वाला है,
सीधी सीधी बातें कहना,
जिसे बिलकुल नहीं आता…..

Thursday 23 October 2008

मेरा तार्रुफ़

मैं वो हवा हूँ जो हमेशा बहती है
मैं वो घटा हूँ जो बरसती रहती है
मेरी साँसों की खुशबू से महकते ही सारी फिजा
मेरी धरकन से वक़्त की रवायत चलती है
मेरी तबस्सुम को तरसते हैं गुल -ओ -गुलज़ार ,
मेरे तसव्वुर से हूर -ए -जन्नत जलती है
मुझसे सुबह होती है , मुझसे शाम ढलती है ...

Wednesday 22 October 2008

हमारी याद आती होगी

कभी तो हमारी याद आती होगी
कभी तो रात को बेताबी सताती होगी
कभी तो माजी टोकता होगा
कभी तो आँख रुलाती होगी ...

कभी तो सावन की झरी में
फिर अरमान मचलते होंगे
कभी तो खिज़ा में
पत्तों के साथ आंसू झड़ते होंगे
कभी तो सर्द रातों में
हमारी कशिश जगाती होगी
कभी तो हमारी साँसों की गर्मी
जिस्म आपका पिघलाती होगी...

कभी तो दीदार की तमन्ना में
पाँव छत तक ले जाते होंगे
कभी तो मिलने की तड़प में
ख्वाब हमारे आते होंगे
कभी तो हमे फिर छूने की चाह
हाथों को तरसाती होगी
कभी तो शाम को पांच बजे
घड़ी की टिक टिक सुनाती होगी

कभी तो दिन ढले
बीते पल बुलाते होंगे
कभी गुज़रते हुए पुराने रस्ते
फिर आवाज़ लगाते होंगे
कभी तो बाहें हमे आगोश में भरने को
फिर मचल मचल जाती होंगी
कभी तो तनहाइयों में
हमारी याद आती होगी....

Tuesday 21 October 2008

शहर के लोग

मेरे शहर के लोग बड़े मसरूफ रहते हैं
खुद ही खुद के नशे में चूर रहते हैं
इश्क क्या है और उसकी शिद्दत क्या
इन बातों से बहुत दूर रहते हैं

ठीक है के हर बाशिन्दे के सिर पे सलीब है
सच है के हर शक्स अजीब है
अपनी शक्सियत का रुबाब को छोड़ के
यहाँ माशूक का गुरुर सहते हैं

कोई गिला नहीं है गर वस्ल-ओ-प्यार न हुआ
कोई शिकायत नहीं गर दीदार-ए-यार न हुआ
अजीब लोग हैं अजीब रवायेतें हैं
के यहाँ सब्र से आशिक दर्द-ए-नासूर सहते हैं

Monday 20 October 2008

एक बार कोशिश करो

आप कब तक, आप कहने की रसम निभायेंगे?
तुम तक पहुँचने में और कितना वक़्त लगायेंगे?
बदती जा रही है चाहतें हमारी पुरजोर
आप कब हमारे इतना करीब आयेंगे?

हम गुस्ताखी पर अमादा होने हों को हैं
आप कब बीच की दूरियों को मिटायेंगे?
अब तलक हमे भी हिचक है बे-तकल्लुफी से
आप कब तक ओर तकल्लुफ़ फ़रमायेंगे?

इन मासूम रिश्तों को परवान चदने दीजिये
आब कब तक इन रिवाजों को निभाएंगे?
आपके लफ्जों में इज्ज़त है आशनाई नहीं
आप कब हमसे यूँ आशना हो पायेंगे?

एक बार कोशिश करो तुम कहने की हमे
आपके आप आप में वरना हम बे-मौत मारे जायेंगे

Friday 17 October 2008

तेरा साया

किसी को कैसे बताएं
तब क्या क्या होता है
जब रात के अँधेरे में
आसमान में चाँद तनहा होता है...

जब हरसिंगार खिलते हैं
जब हवा बहती है
जब मेरा एक ख्वाब
तेरे ख़्वाबों में आकर सोता है…

जब अपने घर के
बाम पर तू खड़ा
मेरे झरोखे की तरफ
चुपके से झाँक रहा होता है…

जब सबा के साथ
खुशबू तेरी आती है
जब सारा आलम मद मस्त सा
तेरे बदन सा महक रहा होता है…

तब तेरा मासूम चेहरा
तेरी आँखें, तेरी साँसे
तेरा साया और तू
मेरे पास कहीं खड़ा होता है

Thursday 16 October 2008

Hurricane rita

कुछ तिनके जोड़े हैं, कुछ गुंजल सुलझाए हैं
कुछ सपनो को निचोड़ कर हमने रंग बनाए हैं
कई फासले तय करे, कई रास्ते साथ लिए
कभी धूप चुराकर, कभी साए थाम लिए
थोडी सी कच्ची मिट्टी, थोड़ा सा ठंडा पानी
कभी दबी हुई सी हंसी , कभी अश्कों की कहानी
कुछ तूफ़ान समेट कर कुछ हवाएं लपेट कर
हम रीता के नाम से इस दुनिया में आये हैं.....
*****


मेरी परवाज़ का अंदाज़ आप यूँ भी लगा सकते हैं
के मेरे पंखों में सबा का ठिकाना है
जो असमाँ में उडू तो उसको भी झुका दूं
के तारों के पार मेरा आशियाना है

Wednesday 15 October 2008

एक लड़का

एक नटखट लड़का है कहीं पर
जो गीत चुनता है
अपने लफ्जों में ना जाने
कितने ख्वाब बुनता है

उसकी कलम में एक जादू है
और हाथों में एक तिशनगी
जाने क्या कुछ कह जाता है
जाने क्या कुछ सुनता है

कभी कभी एक खामोश आवाज़ देता है
कभी कभी जोर से फिर चुप हो जाता है
उस शख्स का क्या कहना जो
खारों से गुलाब चुनता है

निगाहें भी बयानी से कभी
बाज़ नही आती उसकी
तस्वीरों में से भी यू लगे
मेरे दिल की सब बातें सुनता है

मुझ पे अपने शब्दों की
एक खूबसूरत से ओदनी डालता है
न जाने कहाँ से वो इतनी
रेशमी गज़लें बुनता है

Tuesday 14 October 2008

तू इतना ख़ास नहीं

तुम्हारी आँखों की तुम जानो, यहाँ दिल रोता है
बिछड़ने का गम मेरा दामन भिगोता है
तुम्हारी जिद है अपना दर्द-ए-दिल सुनाने की
मेरा क्या, मेरा दर्द मेरे सीने में होता है
*****


चोट की टीस, घाव का अहसास देने वाले
तू इतना गैर नहीं, और तू इतना ख़ास भी नहीं
ओ दर्द देने वाले तेरा भी भला हो
के तू दूर भी नहीं, और तू इतना पास भी नहीं

एक ख़ास दोस्त के लिए....

कभी अजनबी था अब दोस्तों से ज्यादा करीब है
मेरी जान का हाफिज़ और मेरा हबीब है
तुझसे मिलाने वाला महरबानी कर गया
उसके रानाइयों के सदके तू मेरा नसीब है....

मेरे दर पे सिर्फ जोगी आते हैं
आपके आने से हम पे रंग-ए-जमाल आ गया
सर उठा के उसपे जब आँख भर देखा तो
चेहरे पे मेरे, बेकरार दिल का हाल आ गया

जो दर्द मिट गया उसकी शिद्दत भी मिट गयी
जो ज़ख्म भर गया उसकी टीस घट गयी
तू बारहा न खोल उन बंद खिड़कियों को
जो वक़्त के थपेडो से खुद ही सिमट गयी

तबस्सुम मेरे चहरे पे भी खिल खिल जाती है
जब तेरा खिलता हुआ मुजस्मा नज़र आता है
तेरी नज़र गुफ्तगू करती है मेरी निगाहों से
तेरा मुस्काना उसपे तेरा जमाल-ए-रू बढाता है

Monday 6 October 2008

आपकी नज़र

मेरे दिल का हर गोश कभी मोहब्बत से आबाद था
यहाँ गुंजाइश नही थी किसी गम की होने की
बस सोया सा, बेसुध सा, गुमसुम सा पड़ा था
ये आपने चुप चाप से कैसी दस्तक दी.....

बस कहीं एक खालीपन सा छा रहा था
न रंजिश थी इसमें न नफरत इसमें थी
जगाया कितने अरमानों को हौले से पुकार के
कितनी मासूमियत से आपने ये प्यारी हरक़त की....

चेहरे में.....

मेरे चेहरे में कुछ गम्गीनियाँ थी,
कुछ बे-बाक सी बे-तस्किनियाँ थी,
कुछ कच्चे से ज़ख्मों के निशाँ थे,
कुछ दफन हुए अरमानों के पैगाम थे,
अश्कों के बे-हिसाब सैलाब भी थे,
कहीं कुछ टूटे हुए खवाब भी थे,
मगर परदे में से सिर्फ शोखियाँ दिखती हैं,
हिजाब से तिजारत हो तो सिर मुस्कुराहटें बिकती हैं,
इसलिए पर्दा नशीं होकर सामने आते हैं,
हम अक्सर अंधेरों में दिन बिताते हैं......