Monday 6 October 2008

आपकी नज़र

मेरे दिल का हर गोश कभी मोहब्बत से आबाद था
यहाँ गुंजाइश नही थी किसी गम की होने की
बस सोया सा, बेसुध सा, गुमसुम सा पड़ा था
ये आपने चुप चाप से कैसी दस्तक दी.....

बस कहीं एक खालीपन सा छा रहा था
न रंजिश थी इसमें न नफरत इसमें थी
जगाया कितने अरमानों को हौले से पुकार के
कितनी मासूमियत से आपने ये प्यारी हरक़त की....

1 comment:

  1. ritaji aap kamaal ki kalam chalati he........
    .
    .
    bs itana hi likhate he...
    .
    kise yyad rakhoo...kise bhul jau...

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