Tuesday 14 October 2008

एक ख़ास दोस्त के लिए....

कभी अजनबी था अब दोस्तों से ज्यादा करीब है
मेरी जान का हाफिज़ और मेरा हबीब है
तुझसे मिलाने वाला महरबानी कर गया
उसके रानाइयों के सदके तू मेरा नसीब है....

मेरे दर पे सिर्फ जोगी आते हैं
आपके आने से हम पे रंग-ए-जमाल आ गया
सर उठा के उसपे जब आँख भर देखा तो
चेहरे पे मेरे, बेकरार दिल का हाल आ गया

जो दर्द मिट गया उसकी शिद्दत भी मिट गयी
जो ज़ख्म भर गया उसकी टीस घट गयी
तू बारहा न खोल उन बंद खिड़कियों को
जो वक़्त के थपेडो से खुद ही सिमट गयी

तबस्सुम मेरे चहरे पे भी खिल खिल जाती है
जब तेरा खिलता हुआ मुजस्मा नज़र आता है
तेरी नज़र गुफ्तगू करती है मेरी निगाहों से
तेरा मुस्काना उसपे तेरा जमाल-ए-रू बढाता है

2 comments:

  1. बहुत सुन्दर रचना है।बहुत अच्छी लगी।धन्यवाद।

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  2. हर शब्द जेसे कुछ मन की बात कहे रहा हो.... बहुत बहुत सुंदर कविता हैं... जारी रखे इतना सुंदर लिखना... thank u :)

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