Monday 6 October 2008

चेहरे में.....

मेरे चेहरे में कुछ गम्गीनियाँ थी,
कुछ बे-बाक सी बे-तस्किनियाँ थी,
कुछ कच्चे से ज़ख्मों के निशाँ थे,
कुछ दफन हुए अरमानों के पैगाम थे,
अश्कों के बे-हिसाब सैलाब भी थे,
कहीं कुछ टूटे हुए खवाब भी थे,
मगर परदे में से सिर्फ शोखियाँ दिखती हैं,
हिजाब से तिजारत हो तो सिर मुस्कुराहटें बिकती हैं,
इसलिए पर्दा नशीं होकर सामने आते हैं,
हम अक्सर अंधेरों में दिन बिताते हैं......

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