Friday, 28 November, 2008

कुसूर

हद है,कुसूर भी माना उन्होंने
कुछ अकड़ के कुछ बिगड़ के ....

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कोई दर्द में हुआ हो तो हुआ करे
उन्हें अपनी बेपरवाही पे गुरुर है
देख कर एक नज़र उधर देखते हैं
जाने उधर किस शय में क्या सुरूर है ???

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हर बात पे तोहमत लगाते हैं
हर बात पे टोकते जाते हैं
मेरे हबीब हैं वो खुदाया
फिर क्योंकर दुश्मनी निभाते हैं ?

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मेरे चाहनेवालों की फेहरिस्त में आज फिर एक नाम जुड़ गया
उनकी आशिकी का दम भरते थे कभी आज वो दामन फैलाए खड़े हैं

Thursday, 27 November, 2008

रात की बातें

बस थक गए अब तेरे ख़त के इंतज़ार में
कुसूर तेरा या नामाबर का अल्लाह जाने...
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आपकी दोस्ती सर आँखों पे ए दोस्त मेरे
यहाँ लोग कम हैं जो यूँ फ़र्ज़ निभातें हैं
इन्तेहा-ए-जुर्म खुद करते हैं ज़माने भर में
हम बेकसूरों पे सरेआम इल्जाम लगाते हैं
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तेरी रुसवाइयों के सदके मेरी बदनामियाँ हुई
अब खौफज़दा तू क्यूँकर होता है दीवाने मेरे ...
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हर लफ्ज़ में एक ही बात कहे जाते हैं वो
बस शिकायत, और शिकायत, एक और शिकायत
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अब रात की बातें रातों पे छोड़ कर
लो हम चल पड़े एक सुबह की तलाश में...

Wednesday, 26 November, 2008

Bihar: बिहार की त्रसिदी को समर्पित ....

पानी के थपेडो में
तूफान के अंधेरों में
नाखुदा का इंतजार करती
कितनी बेफरियाद है ये जिंदगी
कुछ बेजार सी लगती है
कुछ नाराज़ सी लगती है,
अपनी तो है लेकिन
बड़ी बरबाद है ये जिंदगी
दुओं की आदत नहीं
अजाब से खौफ नहीं
बिन उम्मीद की बेहद
नामुराद है ये जिंदगी
हर रोज दिन से शुरू होकर
हर रात यूँ ही सो जाती है
क्या उस दुनिया में सबकी
यूँ बेबुनियाद है ये जिंदगी
हरसूं एक शोर है
हरसूं एक सन्नाटा भी
गूंगी बहरी लेकिन जिन्दा
क्यूँ इतनी बेजार है ये जिंदगी
सैलाब एक नाशादियों का
भूख का बरबादियों का
गहरे-उथले पानी में
कैसे आबाद है ये जिंदगी
एक उम्मीद बाकि है
कहीं तो इंसानियत जागी है
जोश -ए-जूनून की लेकिन
क्यूँ मोहताज है ये जिंदगी
कुछ रुकी रुकी सी
कुछ थमी थमी सी
एक नयी सुबह की
करती इजाद है ये जिंदगी

Tuesday, 25 November, 2008

सब्र

सब्र की मियाद ख़तम होने को है शायद
कहीं से रुक्सती का एक पैगाम आया है
राहों में दरख्त फिर से हरे हो गए अब, के
एक हवा का झोंका उनके आने का संदेस लाया है

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यादें शब् भर शम्मा बन जाने की ख्वाइश रखती हैं
एक परवाना ही नहीं मिलता जो खुद जला सके


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इस कदर उसने इतरा के मेरी तारीफ़ की एक दिन
हर हर्फ़ मेरे सफ्हे का मुक्कम्मल हो गया

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इस रंगत की शोखियों पर उनकी नज़रों की शरारत
एक घड़ी में एक जिंदगी बिता दी यूँ ही तकते तकते ...

Monday, 24 November, 2008

इरतिका-ए-जिंदगी

तुम कहते हो सुनो, दर्द उनकी सिसकियों का
मैं कहती हूँ, मैंने देखा ज़ख्म जहाँ थे
उस देश के लोगों को गवांरा था यूँ घुट के मरना
उस देश की लोगों में लड़ने के हालात कहाँ थे
हर सरकार लूटती थी हर शहर हर गली को
उनके आगे चंद लोगों के नाल-ए-फरीयाद रवां थे
फिर भी पत्थर कूटते उन हाथों में हर वक़्त
मुल्क की इरतिका-ए-जिंदगी के अरमान जवां थे



इरतिका-ए-जिंदगी - progress of life

Friday, 21 November, 2008

मुकाम

उफ़!!! इतनी इज्ज़त मिली जिसके हम काबिल न थे
ये मुकाम जो आज मिले हमे अब तक हासिल न थे

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एक आदत सी पड़ गयी है उनको हमे छेड़ जाने की
क्या कहें उनसे के अब रुत बीत गयी रूठने मनाने की
हर पल इंतज़ार रहता था उनके आने का हमे, लेकिन
वक़्त ने इजाज़त नहीं दी उन्हें मेरे पास आने की

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तेरी ख्यालों में वक़्त गुज़रता है आजकल
ज़हन में सिर्फ तेरा मुजस्मा समाता है
हर लम्हा तेरे जानिब दिल खिंचता है
हर ख्वाब तेरी आँखों में बसना चाहता है

Thursday, 20 November, 2008

उसका नशा

छलका के जो नज़रों से, मेरी जानिब देखा उसने
हर मय का सुरूर कुछ फीका सा पड़ने लगा
कैफ का काम करता था जो पैमाना मखमूर का
तेरी आँखों की शराब में उसका नशा ढलने लगा

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इतनी बारिश में बिन छतरी के नंगे पावं छत पे वो आये
लिल्लाह कैसे कैसे मेहनत-ए-पैहम किये मेरे एक दीदार को

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हर रोज़ एक फूल भेजता है वो मुझे ख़त में
लेकिन उसकी खुशबू ख़त ही चुरा लेता है
मेरे दोस्त मगर तेरी भेजी तितलियों से
ये दिल खेल कर खुद को बहला लेता है

Wednesday, 19 November, 2008

एक अनजाना

कोई बंद दरवाजा दोबारा खटखटा रहा है
एक अनजाना शख्स करीब आ रहा है
अंदाज़-ए-बयानी का अंदाज़ कुछ नया सा है
हाल-ए-दिल पहेलियों में सुना रहा है

गुपचुप सारे जहां का हाल बताता है
हर रोज़ एक नया किस्सा सुनाता है
मेरे कानों में हौले से गुनगुनाकर
न जाने कितने गीत बुनता जाता है
हजारों ख्वाब मेरी सूनी पलकों पर
अपने हाथों से सजा रहा है
कोई बंद दरवाजा दोबारा खटखटा रहा है
एक अनजाना शख्स करीब आ रहा है

मेरी धडकनों में अपना नाम सुनता है
मेरी साँसों से अपनी साँसें चुनता है
उसकी कोशिशों की क्या मिसाल दूं, के
उनको कामयाबी का जरिया बना रहा है
कोई बंद दरवाजा दोबारा खटखटा रहा है
एक अनजाना शख्स करीब आ रहा है


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आपके खाव्बों की रहगुज़र से मेरा रस्ता भी गुज़रता है
तस्कीनियाँ आपकी आरजू है, शादमानी मेरी हसरत हैं

Tuesday, 18 November, 2008

सुबहों में मेरा बसेरा है

मेरे ख़्वाबों की ज़मीं ला-महदूद है
हर शख्स का इधर बसेरा है
यहाँ एक ख्वाब अनजाना सा है
और एक ख्वाब सिर्फ मेरा है

उनकी हस्ती को भुला दिया जो
हर तोहफा ज़ख्मो भरा देते थे
अब रातों से मुझे क्या काम
जब सुबहों में मेरा बसेरा है

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सद कोशिशें की उनसे दूर जाने की
हर गाम पे यूँ लगा फिर आवाज़ लगाई...

Monday, 17 November, 2008

सांझी ज़मीं

दर्द सांझा, लहू सांझा, सांझी ये ज़मीं है
हरेक मगर इसमें एक टुकडा मांगता क्यों है?
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एक मजहब, एक ज़ात, एक ही जज़्बात है,
कमबख्त आदमी ही आदमी को नहीं पहचान पाता

Friday, 7 November, 2008

इंसान की सोच

सोचना फितरत है इंसान की सोचना फिर आदत बन जाती है
ये इंसान की सोच ही होती है जो उसको चाँद की सैर कराती है
सागर का सीना चीरना कोई बच्चों का खेल नहीं
इंसान की सोच ही उसको जहाज़ बनाना सिखाती है
आसमान की ऊँचाइयों पे कब्ज़ा है पंछियों का सदियों से
एक सोच इंसान की उस आसमान तक जो झुका जाती है
सोच अगर सही तो इर्तिका-ए-जिंदगी मिलती है सभी को
अगरचे बेकार सोच इस जहाँ मैं सिर्फ तबाही मचाती है

Thursday, 6 November, 2008

किस्मत

दिल के अमीर अक्सर जेब से फकीर होते हैं
बे-ज़मीरों की इस दुनिया चंद ही बा-ज़मीर होते हैं
हक छीनने वाले चप्पे चप्पे पे मिल जायेंगे लेकिन
हक का देने वाले शुमार में बसीर होते हैं
हंस दे कोई मुफलिसी में तो खुदा का नेक बन्दा है
गरीबी में ही इंसान नानक और कबीर होते हैं
जुल्म करना आदमी की फितरत में मौजूद है
ज़ुल्म सहने वाले आदमियत की तामीर होते हैं
तू गम न कर, यहाँ हर तरह के लोग हैं
कोई तकदीरवाले हैं कोई किस्मत से हकीर होते हैं

Tuesday, 4 November, 2008

ढेर सारा अँधेरा

खाली कमरों में हम दिन गुजारते थे
काली स्याह रातों का भी वहीँ डेरा था
जिस शख्स को उन कमरों में खो दिया
बस, दीवारों के इलावा वही शख्स मेरा था
बड़ी भीड़ थी सामान की बंद दरवाज़े की पीछे
धूल की परत भी बिस्तर पे छाई हुई थी
बरसों से वीरान कमरे के आईने के पीछे
तेरा गुमसुम साया और ढेर सारा अँधेरा था

Monday, 3 November, 2008

Just.....

मस्त हैं हम जहां की मस्तियों में डूब कर
कौन है भला जो हमसे निजात पा सके...
कोशिशें लाख करते हैं ज़माने वाले रोज़ ब रोज़
ना किसी में दम नहीं जो हमारे नज़दीक आ सके ...

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हद है के वो उल्फत को अहसान समझ बैठे
काली स्याह अब्र को आसमान समझ बैठे
मेरी आवाज़ घायल थी दर्द के ज़ख्मों से
उनकी नवाजिश थी के वो उसे आजान समझ बैठे

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यादों का काम है तड़पना और तडपाना
इस नामाकूल से कौन कमबख्त ऐंठता है ....