Wednesday 26 November 2008

Bihar: बिहार की त्रसिदी को समर्पित ....

पानी के थपेडो में
तूफान के अंधेरों में
नाखुदा का इंतजार करती
कितनी बेफरियाद है ये जिंदगी
कुछ बेजार सी लगती है
कुछ नाराज़ सी लगती है,
अपनी तो है लेकिन
बड़ी बरबाद है ये जिंदगी
दुओं की आदत नहीं
अजाब से खौफ नहीं
बिन उम्मीद की बेहद
नामुराद है ये जिंदगी
हर रोज दिन से शुरू होकर
हर रात यूँ ही सो जाती है
क्या उस दुनिया में सबकी
यूँ बेबुनियाद है ये जिंदगी
हरसूं एक शोर है
हरसूं एक सन्नाटा भी
गूंगी बहरी लेकिन जिन्दा
क्यूँ इतनी बेजार है ये जिंदगी
सैलाब एक नाशादियों का
भूख का बरबादियों का
गहरे-उथले पानी में
कैसे आबाद है ये जिंदगी
एक उम्मीद बाकि है
कहीं तो इंसानियत जागी है
जोश -ए-जूनून की लेकिन
क्यूँ मोहताज है ये जिंदगी
कुछ रुकी रुकी सी
कुछ थमी थमी सी
एक नयी सुबह की
करती इजाद है ये जिंदगी

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