Friday, 21 November, 2008

मुकाम

उफ़!!! इतनी इज्ज़त मिली जिसके हम काबिल न थे
ये मुकाम जो आज मिले हमे अब तक हासिल न थे

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एक आदत सी पड़ गयी है उनको हमे छेड़ जाने की
क्या कहें उनसे के अब रुत बीत गयी रूठने मनाने की
हर पल इंतज़ार रहता था उनके आने का हमे, लेकिन
वक़्त ने इजाज़त नहीं दी उन्हें मेरे पास आने की

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तेरी ख्यालों में वक़्त गुज़रता है आजकल
ज़हन में सिर्फ तेरा मुजस्मा समाता है
हर लम्हा तेरे जानिब दिल खिंचता है
हर ख्वाब तेरी आँखों में बसना चाहता है

2 comments:

  1. Dear Rita ,

    " तेरे ख्यालों मे वक्त गुजरता है आजकल "

    आज तुम्हारी ये नज़्म पढ़ी , मन में लहरें सी उठ गई.. कितनी नाज़ुक नाज़ुक पंक्तियाँ है , समय के अहसास को साथ लिए चलती है ..

    बहुत बधाई

    विजय
    www.poemsofvijay.blogspot.com

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  2. बहुत बहुत सुंदर lines हैं.... पड़ कर बहुत अच्छा लगा... जारी रखें रिता

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