Tuesday 18 November 2008

सुबहों में मेरा बसेरा है

मेरे ख़्वाबों की ज़मीं ला-महदूद है
हर शख्स का इधर बसेरा है
यहाँ एक ख्वाब अनजाना सा है
और एक ख्वाब सिर्फ मेरा है

उनकी हस्ती को भुला दिया जो
हर तोहफा ज़ख्मो भरा देते थे
अब रातों से मुझे क्या काम
जब सुबहों में मेरा बसेरा है

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सद कोशिशें की उनसे दूर जाने की
हर गाम पे यूँ लगा फिर आवाज़ लगाई...

2 comments:

  1. yahan ek khwaab anjana sa hai aur khwaab sirf mera hai......
    ye pankhtiyaan bahut hi sundar hain.....

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  2. और एक ख्वाब सिर्फ़ मेरा हैं... वाह.... हर पंक्ति बहुत सुंदर हैं.... धन्यवाद और जारी रखे...

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