Friday 7 November 2008

इंसान की सोच

सोचना फितरत है इंसान की सोचना फिर आदत बन जाती है
ये इंसान की सोच ही होती है जो उसको चाँद की सैर कराती है
सागर का सीना चीरना कोई बच्चों का खेल नहीं
इंसान की सोच ही उसको जहाज़ बनाना सिखाती है
आसमान की ऊँचाइयों पे कब्ज़ा है पंछियों का सदियों से
एक सोच इंसान की उस आसमान तक जो झुका जाती है
सोच अगर सही तो इर्तिका-ए-जिंदगी मिलती है सभी को
अगरचे बेकार सोच इस जहाँ मैं सिर्फ तबाही मचाती है

3 comments:

  1. बहुत बहुत सुंदर लिखा हैं... really very inspiring... so true and thoughtful... thank Rita and keep it up.. :)

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  2. सोच पर आप ने अच्छा लिखा है

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