Thursday 20 November 2008

उसका नशा

छलका के जो नज़रों से, मेरी जानिब देखा उसने
हर मय का सुरूर कुछ फीका सा पड़ने लगा
कैफ का काम करता था जो पैमाना मखमूर का
तेरी आँखों की शराब में उसका नशा ढलने लगा

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इतनी बारिश में बिन छतरी के नंगे पावं छत पे वो आये
लिल्लाह कैसे कैसे मेहनत-ए-पैहम किये मेरे एक दीदार को

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हर रोज़ एक फूल भेजता है वो मुझे ख़त में
लेकिन उसकी खुशबू ख़त ही चुरा लेता है
मेरे दोस्त मगर तेरी भेजी तितलियों से
ये दिल खेल कर खुद को बहला लेता है

4 comments:

  1. हर मय का सुरूर कुछ फीका सा पड़ने लगा.... बहुत खूब... :)

    मगर तेरी भेजी तितलियों से ये दिल खेल कर ख़ुद को बहला लेता हैं... क्या बात हैं... :) बहुत खूब...

    कृप्या जारी रखे इतना सुंदर लिखना... आप एक बहुत संजिंदा कवियेत्री हैं.. हमेशा एसी ही रहें रिता.. :)

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