Tuesday, 4 November, 2008

ढेर सारा अँधेरा

खाली कमरों में हम दिन गुजारते थे
काली स्याह रातों का भी वहीँ डेरा था
जिस शख्स को उन कमरों में खो दिया
बस, दीवारों के इलावा वही शख्स मेरा था
बड़ी भीड़ थी सामान की बंद दरवाज़े की पीछे
धूल की परत भी बिस्तर पे छाई हुई थी
बरसों से वीरान कमरे के आईने के पीछे
तेरा गुमसुम साया और ढेर सारा अँधेरा था

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