Friday 21 March 2014

खुद को इतना झुकाओ के जिसके आगे झुको
उसका हाथ तुम्हारे सर पर आकर ठहर जाए,
मगर खुद को उसके क़दमों में यूँ मत गिराओ
के वो तुम्हें ठोकर मार के बेरुखी से गुज़र जाए ...
फरिश्तों के साथ वक़्त क्या गुज़ारा
दुरुस्त सारा बदरंग नज़ारा हो गया
दिल ज़ाकिर जो हुआ, सो हुआ खैर
वो मोहसिन खुदा का हमारा हो गया ...

farishta - angel
durust - positive
badrang - negative
zaakir - grateful
khair - but
mohsin - angel

i spent some time with an angel and my negativity turned into positive energy. my heart is grateful to god for sending that angel to me...
तुम नज़र अंदाज़ करोगे तो हम दरकिनार कर देंगे
नाज़ उठा सकते हैं तुम्हारे, नखरे मगर तौबा तौबा ...
हर बात पर चुटकी लेते हो, हर बात पर छेड़ देते हो
बाज़ आते नहीं, और उसपे ये मिजाज़ तौबा तौबा ...
परिंदों परों पे तिनकों का बोझ तब उठाते हैं
जब किसी दरख़्त पर आशियाना बनाते हैं
आसमान छूने का हौसला जब आ जाता है
अपने परों की परवाज़ तब ही आज़माते हैं
गर ज़रुरत होगी मेरी तो वो ढूंढ ही लेगा मुझे
मैंने भी तो कई बार खुद को ढूँढा है उसके लिए
बेदखल भी तो नहीं करते मुझे अपनी ज़िंदगी से
बस एक बार इतना कह दो के तुम मेरी कोई नहीं..
जिन्होंने उजालों की तलाश में सारे दिये बुझा दिए
वो अब रौशनी को तरसते हैं हाथों दियासिलाई लेके...
अब रूठा भी नहीं जाता है मनाया भी नहीं जाता है
फासला इतना है के पास बुलाया भी नहीं जाता है
दिखायी देते हैं दूर से दोस्त, जो दुश्मनी निभाते हैं
दिल फरेब इतने के उन्हें साथ बिठाया नहीं जाता

क्या मेरी तरह सब थक जाते हैं?

जब जीवन में एक अर्ध विराम आता है
जब ऐसा लगता है सब कुछ कर लिया
और अब कुछ और नहीं है करने को ...

जब बच्चे बड़े हो कर अपनी मंज़िल को
पाने के लिए दूर देश निकल जाते हैं
जब रिश्तों में एक ठहराव सा आ जाता है
जब पुराने दोस्त बिछड़ने लगते हैं
और नए दोस्तों कि ज़रुरत महसूस नहीं होती ...

सुबह उठकर ये सोचते हैं आज क्या करें
शाम तक दिन बिताना है मगर कैसे
और रात को सोते वक़्त सोचा जाता है
सुबह उठकर क्या बनाना है और क्यूँ ?

उम्र ज़यादा नहीं है मगर कम भी नहीं है
वक़्त गुज़र भी गया और बचा भी है
जो वक़्त बीत गया वो शायद ठीक ही था
मगर तब यूँ लगता था ये वक़्त बुरा है ...

तब भी उससे शिकायतें थीं अब भी हैं
शायद शिकायत करना आदत बन गयी है
सबसे ही शिकायत करते हैं आदतन
वक़्त से, दोस्तों से, दुश्मनों से, अपनों से
और खुद से भी ...
अभी जीना है क्यूंकि अभी उम्र बाकी है
शायद इसलिए थक गयी हूँ

शायद इसलिए थक गयी हूँ ....
कोई वादा, कोई करार न ले, के 
मेरा मुझ पर कोई इख्तेयार नहीं 
मेरा खुद से मरासिम है जीने का 
और किसी से कोई दरकार नहीं

karaar - promise
ikhteyaar - right
maraasim - agreement
darkaar - desire