Tuesday 14 October 2008

तू इतना ख़ास नहीं

तुम्हारी आँखों की तुम जानो, यहाँ दिल रोता है
बिछड़ने का गम मेरा दामन भिगोता है
तुम्हारी जिद है अपना दर्द-ए-दिल सुनाने की
मेरा क्या, मेरा दर्द मेरे सीने में होता है
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चोट की टीस, घाव का अहसास देने वाले
तू इतना गैर नहीं, और तू इतना ख़ास भी नहीं
ओ दर्द देने वाले तेरा भी भला हो
के तू दूर भी नहीं, और तू इतना पास भी नहीं

3 comments:

  1. बढिया मुक्तक हैं।बधाई।

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  2. लेखन ज़ारी रखें, शुभकामनाएँ!

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  3. दर्द भरी.. अच्छी हैं... keep it up..

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