Thursday, 30 October, 2008

तो कोई बात है

छोड़ के नफरत मेरी करीब आओ तो कोई बात है
भूल कर ग़मों को मुस्कुराओ तो कोई बात है
धूप में तो सब गुज़ारा कर ही लेते हैं मर खप कर
तूफानी गलां में जी कर दिखाओ तो कोई बात है
फिरदोस है जन्नत है इसमें किसको शक भला
हाँ, दोज़ख में खुशियाँ बिछाओ तो कोई बात है
दरिया में उतरते हैं तो पार लग ही जाते हैं
डूब कर सागर करीं आ जाओ तो कोई बात है
हर एक शख्स अपनी असीरी में सदियों से कैद है
दुश्मनों की जंजीरें तोड़ आओ तो कोई बात है
फूल हैं तो महकेंगे ही के उनकी ये ही फितरत है
सहरा में गुलशन को बसाओ तो कोई बात है

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