Monday 29 December 2008

मेहमान मौसम

ये ज़रूरी तो नहीं के मौसम को मेहमान बनाया जाए
इस बरसती बारिश का अहसान जताया जाए
गुपचुप बादल खुद भी बरसें हैं भीगे भीगे से
फिर क्यूँ काली घटाओं से आँचल को सजाया जाए

उसका आना तरबतर होकर एक छतरी से ढककर भी
उसपर दुपट्टे से टपकता टिप टिप पानी गिरता हुआ
गीले गीले बालों से आता खुशबू का झोंका
ऐसे में इन हवाओं का, सच में, अहसान मनाया जाए

हर बूँद में मस्ती सी भरी हुई हो शराब की
हर छुअन में उसकी ताब हो आतिश भरा
ऐसे में छज्जे के नीचे खडा हुआ में सोच रहा
आज फिर सर पे छत को क्यूँ ओड़ाया जाए

1 comment:

  1. रीटाजी हमेशा ही इतना सुंदर लिखतीं हैं के कभी थोड़ा सामान्य (average) भी.... again such wonderful lines.... congrats... :)

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