Wednesday 3 December 2008

JAGRAN

कब तक और कब तक
फसले-गुल के मौसम में
गोलियां उगायेंगे?
पड़ोसी मुल्क के बाशिंदे
हमारा कितना लहू बहायेंगे?
और हमारे देश के लोग
कब होश में आयेंगे?
शहीदों की मौत पर कब
नकली नेता सच्चे आंसू बहायेंगे?
सचमुच जिंदगी इतनी सस्ती है
कब हम इसके सही मोल लगायेंगे?
जगाया उसको जाता है
जो सोया होता है
जागे हुओं को कितने बम्ब जगायेंगे?
बस, अब हद से बाहर हो गया
बर्दाश्त भी और नहीं होता
और कितने दंगों के बाद हम हिन्दुस्तानी
गनीम-ए-शहर में आतिश्बारी करवाएंगे?
शर्म औरत का गहना होती है
लगता है अब आदमी उसको अपनाएंगे
और चूड़ियाँ पहनने वाले हाथ
आखिरकार बंदूकें उठाएंगे...
गर बुरा लगा तो बुरा मान लो
और हिम्मत-ए-मर्दा-मदद-ए-खुदा जान लो
उठा लो तलवार बाँध के कफ़न
चलो यूँ ही सही उकसा कर
हम अपने लोगों को बहादुर बनायेंगे...
बहुत झुक लिया, बहुत सह लिया
अब और नहीं सह पायेंगे
आज प्रण करो...खुद से
हम अपने देश को
इस आतंक
इन आतंकवादियों से बचायेंगे!

गनीम-ए-शहर - दुश्मन देश

1 comment:

  1. बुल्कुल सटीक और कठोर और सही लिखा हैं.... हर शब्द जेसे दिल से निकला हों... हर शब्द एक अंगारे जेसा लग रहा हैं... काश ज्यादा से ज्यादा लोग इन अंगारों से जल कर जागें.... बहुत बहुत धन्यवाद रिता....

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