Monday, 1 December, 2008

For the soilders/policemen who lost their lives fighting terrorism in mumbai...26/11/2008

समेट कर आग सीने में जब वो घर से निकला होगा आग बुझाने को
कितने आईने देखें होंगे अपनों के अक्सों को आँखों में छुपाने को

रात में नीदों का साया फिर नहीं आएगा उसके मकां पे
वो अपना आशियाना छोड़ कर गया था औरों के घर बचाने को

तान के बन्दूक जा खड़ा हुआ बन्दूक के आगे शेर दिल
लौटा नहीं जिंदा, तो क्या फौजी बना ही था मुल्क पे मर जाने को

कुछ सरकारी तमगे मिलें और मिला कुछ लाख का मुआवज़ा
अब सलाम करें या शहादत का नाम दें के वो मरा देश बचाने को

किसके साथ क्या हुआ कौन मरा कौन बचा और फिर वो ही मुक्कदमा
इन्साफ की मत पूछो, के इन्साफ यहाँ का है सिर्फ खिल्ली उडाने को

उस मुल्क पे ओड़ के गुनाहों का सारा इल्जाम अपना गिरेबां झाड़ लिया
इस मुल्क का नेता जीता है मासूमों के लहू से अपनी प्यास बुझाने को

1 comment:

  1. ये बुजदिली नहीं के कत्ले-आम पर आंसू बहा लिए
    हमने इंसानियत और शराफत को विरासत में पाया है
    मेरी चूड़ियों को देख कर मुझे कमज़ोर न समझना
    मेरे देश के जवानों की बेखौफ दिलेरी मेरा सरमाया है

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