Sunday 29 April 2012

bus yun hii


ये दिल खाली खाली सा लग रहा है
कोई चुप चाप यहाँ से गुज़र रहा है
मुड़ मुड़ के देखा कहाँ कहाँ तक
वो आशना कुछ पराया लग रहा है
हमने जिसके दामन से लिपटना चाहा
वो अजनबी बन दामन झटक रहा है
मुद्दत बाद मिलकर भी क्या मिला
अब तक क्यूँ ये दिल भटक रहा है
हमने दोस्तों के  चेहरों में ढूँढा खुद को
हर दोस्ताना चेहरा अपनापन तज रहा है
शिकायत  भी करें  तो  किससे  करें
हर शख्स अपनी सलीब पे सज  रहा है
खून का कतरा कतरा रिसता रहता है
और मलहम को ज़ख्म तरस रहा है
हाल ए दिल ने शायरी सिखा दी यारों
अब हर लफ्ज़ दर्द बन कर बरस रहा है

1 comment: