Sunday 10 March 2013


उनको आदत है अपने ख़त का मज़मून यूँही बदलने की
और हम उनके हर लफ्ज़ को एक पैगाम समझ लेते हैं
वोह आदतन ही दरवाज़े बदल देते हैं अपनी दीवारों के
और हम उन पत्थरों को चिलमन-ओ-शाम समझ लेते हैं
वोह हर हसीन चेहरे पर ग़ज़ल सुना कर चले जाते हैं
और हम उनकी हर नज़्म को अपने नाम समझ लेते हैं
वोह अक्सर हमारी गली से गुज़र रकीबों के शहर जाते हैं
हम उन कदमों को हमारी जानिब उठा गाम समझ लेते हैं

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