Friday 23 January 2009

बस यूँ ही

क्यूँ वक़्त के मोहताज हैं, क्यूँ किस्मत पे तुम्हें नाज़ है
क्या नहीं किया तुम न सोचो, क्या किया जिसपे ज़माने को ऐतराज़ है

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लफ्ज़ नहीं मिलते जज़्बात नहीं मिलते
दिल नहीं मिलते खयालात नहीं मिलते
नफरत करना आसान है इस जहां में
मुहब्बत करने के आजकल हालात् नहीं मिलते

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एक दाद सुनने को हमने दीवान लिख डाले
अब ये बेनूर आँखें चिरागां हुई जाती हैं

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सिर्फ एक चेहरा होता तो सिमट सकता था ख़्वाबों में
यहाँ हर किसी के चेहरे पे कई मुखौटे लगे रहते हैं
परत दर परत खुरच के देखा भी यारों हमने
हर सुहानी सूरत के पीछे डरावने जज़्बात पड़े रहते हैं

2 comments:

  1. सुंदर शायरी हैं... आपकी हर पंगती एक मतलब लिए हुए हैं जेसे.... बहुत अच्छा लिखा हैं... कृप्या जारी रखे

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  2. सुंदर शायरी बस अब इसे जारी रखें

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