Thursday 22 January 2009

एक आम आदमी

हर कमान आज खाली है तेरे तीर से
खामोशी बंध नहीं सकती ज़ंजीर से
रोक नहीं सकते वक़्त-ए-गर्दिशी को
क्या लडेगा कोई भला तकदीर से
जंग जारी है ज़माने भर में आज
हर तरफ इल्जाम हैं संगीन से
मौत की ख्वाइश न कर बाशिंदे तू
मौत भी यहाँ मिलती है तकदीर से ...

2 comments:

  1. एक आम आदमी की थकान और रोज के जूझने को दुखी मन में डुबो के आपने शब्दों में पेश किया हैं इस कविता में.... दिल को छूने वाला प्रयास.... Very nice

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  2. har kamaan aaj khaali hai tere teer se, khaamoshi bandh nahi sakti kisi zanjeer se, rok nahin sakte waqt-e-gardishi ko, kya ladega koi bhalaa taqdeer se, jung jaari hai zamaane bhar mein aaj, har taraf ilzaam hein sangeen se, maut ki khwaaish na kar baashinde tu, maut bhi yahan milti hai taqdeer se...

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