Monday 2 February 2009

उनका गिला

कुछ बूँदें बारिश की उधार मांग लो आज ही
मेरे छज्जे पे इबके बहुत सावन बरसा है
कई मोर ढूंढते हैं नाचने को घटा काली
और लैला का दिल बारिश में मजनू को तरसा है
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उनका गिला के हम दूरियां बढाने लगे हैं
उनको शिकवा के हम मुहं छुपाने लगे हैं
हम पर्दानशीं हैं शरमसार नहीं, क्या हक
उन्हें, जो हम पर यूँ इल्जाम लगाने लगे हैं
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आपकी हर बात पे मर जाने को जी करता है
आपकी हर बात जीने का सबब भी है लेकिन ...
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कई रास्तों से गुज़र कर तेरी अंजुमन में तशरीफ़ लाये हैं
एक जाम मेरे महबूब के नाम साकी महफ़िल को पिला
देख किस कदर खामोश बैठे हैं सब बादाकशीं सर झुकाए
उठाकर अपना पैमाना भी उसके नाम से आ ज़रा नजदीक आ
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तुझको मेरी रुसवाई का वास्ता है,
आ एक बार फिर मुझे बदनाम कर
आ एक बार फिर मेरे करीब आ
आ एक बार फिर मेरे कत्लेआम कर ...
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खुदी को कर बुलंद इतना के हर नज़र तेरी जानिब उठे बा-हौसला
और झुका कर सर अपना कबूल तू हर ख़ास-ओ-आम का सजदा

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