Thursday, 5 February, 2009

दोस्त

मेरी शाम की उदासी तेरी सुबह मिटाती है जब
हर शब् मेरी याद तुझे याद कर सो जाती है
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मौज हूँ, लेकिन मौज नहीं करती साहिल से के
वो मेरा रहनुमा बनकर मुझे रोज़ ठुकराता है
हर लहर को बुला कर वो बेदर्द सागर करीं
बड़ी बेशर्मी से सभी की सीपियाँ चुराता है
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इतनी उम्मीद रखी उस नामुराद ने मुझ बेगानी से
खुद पे शरमनिसार हुई जब नाउम्मीद, मेरे दर से वो गया
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उसका रकीब बनने से पहले खुदाया समझ लेना
वो एक चारागर है, और तुम हो एक बीमार
दोस्ती रखोगे तो मिजाज़ पुरसी को आयेंगे
वरना कौन यहाँ किसका होता है तीमारदार ???

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