Friday 3 June 2011

हाथ बिलकुल खाली हैं मगर दिल भरा है
किसी का ख्याल अब तक मेरे ज़हन में खड़ा है
देख कर खुदा की मेहरबानी उसका करम भूल गए
के सर उसके सजदे में झुकने को अड़ा है
क्या कोई इंसान बुतपरस्ती के काबिल है
क्या कोई इंसान सचमुच इतना बड़ा है
हर तरफ से मायूसी झांकती थी हर सुबह
उसकी नवाजिश हुई तो ख़ुशी से दिल रो पड़ा है
बुझा देता था चिरागों को रात रात भर जलाकर
बहुत देर तक ये दिल अकेला अंधेरों से लड़ा है

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