Thursday 9 June 2011

प्यार की दीवानगी इंसान को खुदा बना देती है
वरना कौन है जो ऐसे इस्तकबाल के काबिल है
इस जहां में अब एक भी इंसान नहीं मिलता
बस इक भीड़ है और भीड़ में खुदा का मिलना मुश्किल है

हमारा क्या हम तो बुतपरस्ती को मजबूर हैं
खुदा के करीब, लेकिन खुद से बहुत दूर हैं
अपने जैसा एक दीवाना ढूढ़ते हैं दोस्तों में
जो मेरी तरह दिलशाद है मेरे जैसा आदिल है

जो चुप नहीं रहते, वो बगावत करते हैं
और उन्हें ही आदतन तवज्जो दी जाती है
हैरान है दिल ये देखकर के ज़माने में
कामयाब वो हाथ है जो दस्त-ए-कातिल है....

जो दबा लेते हैं दर्द-ओ- जज़्बात यहाँ
और मुस्कुराकर हर गम भुला देते हैं
यहाँ ना-शऊर ही समझा जाता है उन्हें
बेशक वो ज़माने के बेहतरीन फ़ाज़िल हैं ....

मत छोड़ो जो तुम्हारा है, छीन लो या तबाह कर दो
इस दुनिया का दस्तूर यही रह गया है
खंजर सब आस्तीन में छुपाये बैठे हैं
कटते वो मासूम हैं जो इस फितरत से गाफिल हैं

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