Saturday 18 June 2011

जिंदगी की सुबह बिछड़े थे, जिंदगी की शाम को मुलाक़ात हुई
बहुत अरसा बीत गया दरमयां, बहुत मुद्दत के बाद उनसे बात हुई
मासूमियत की जो पल साथ बिताये थे,
हम तो अपनी मिलकियत समझ साथ ले आये थे
हमने बहुत मौसम देखे उन दिनों
मगर न जान सके उनकी जिंदगी में कितनी बरसात हुई
सब्र किया बरस दर बरस
और दिल ही दिल में गुफ्तगू होती रही
हमारा क्या हम तो तभी उनके हो गए थे
उनकी बीती हुई हर रात चाहे किसी और की सौगात हुई
अब भी जो मिलीं तो परछाईयां मिलीं
और परछाईयां पकड़ी नहीं जातीं
हम ख्वाब और हकीक़त में फर्क भुला बैठे थे
जब ख्वाब टूटा तो अपनी ही हालत दर्दनाक हुई

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