Tuesday 22 January 2013

जिंदगी का जिंदगी से बड़ा अजीब नाता है
कोई नज़र से दूर होते ही दिल से उतर जाता है
तस्वीरों को ताकें भी तो आखिर कब तक ताकें
भला तस्वीरों से निकल कर कौन बाहर आता है ....

परिंदा पर टूटने पे भी आसमां की तम्मना करता है
और हवाओं में परवाज़ के ख्वाब सजाता है
बेचारा गिर जाता है जब जब कोशिश करता है और
लाचारी से वो अक्सर क़दमों पे भी लडखडाता है

दुःख बांटने से घटते और सुख बांटने से बड़ते हैं
फिर भी इंसान दूसरों को दुःख देकर सूकून पाता है
मगर तब उसकी हंसी खो सी जाती है
जब ख़ुशी के लम्हों में खुद को तनहा पाता है

बहुत गहरा राज़ छुपा है जीवन के सागर में
कोई पार कर के डूबता है कोई डूब कर पार पाता है
तूफानों से टकराकर भी कई सफीने साहिल पे आते हैं
कभी शांत समंदर भी किनारे पे खडा बेड़ा डुबाता है ....


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