Monday 25 April 2011

रात भर उसके ख़त का इंतज़ार करते रहे
हर आहट पे जीते रहे, मरते रहे
दिल-ए-मासूम को एक बार फिर तोड़ दिया उस बे-मुर्रव्वत ने,
हम करवट करवट वक़्त के साथ गुज़रते रहे
न सलामती बताई, न हाल-अहवाल लिया
हम अंधेरों से तनहा ही लड़ते रहे
मौला क्यूँ किसी बे परवाह से यूँ मोहब्बत हो गयी
क्यूँ भरी महफ़िल में उसका दम भरते रहे ?

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