Sunday 20 May 2012


सदियों इंतज़ार किया, सालों इंतज़ार करवाया
फिर भी उसको मेरी मोहब्बत पर यकीन न आया
अपने सब गुनाह नज़र अंदाज़ कर दिए उसने
और मेरे एक कुसूर को, सौ सौ बार गिनाया
हर रोज़ हाल -ए-दिल सुनाते रहे कई तरकीबों से
हर रोज़ वो नज़रें चुराता रहा अपने रकीबों से
हमने ज़माने भर में खुद को रुसवा कर डाला
शायद उसे मेरा अंदाज़-ए-बयानी ही पसंद न आया
बड़ा गुरुर था  बड़ा सुरूर था, बड़ा ही वो बेमानी था
रुखा था, बेपरवाह था  और बड़ा ही बे- रूमानी था
फिर भी मेरे नासमझ दिल ने क्यूँ उस बेदर्दी से दिल लगाया
क्यूँ खुदा का सा रुतबा दिया क्यूँ सजदे में सर झुकाया ????

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