Monday 2 July 2012


हमने अपना इश्क ज़माने में सरेआम कर डाला
खुद ही खुद को जहां भर में बदनाम कर डाला
तुम ने तुम तक पहुँचने के सब रास्ते बदल डाले
मेरे जूनून ने एक पुल बनाने का अंजाम कर डाला
तुम दरवाजों और खिडकियों पर पर्दा करते रहे
मेरी दीवानगी ने आसमान तक को बार कर डाला
तुम मेरे भेजे पैगाम चुपचाप पढ पढ जलाते रहे
हमारे इश्तेहारों ने मगर ख़त का काम कर डाला
ये चारागर भी कितना हैरान है मुझे जिंदा देख कर
के मेरी जिद ने ज़हर को दवाओं का नाम कर डाला
हम चिराग-ए-मोहब्बत जलाते रहे, तुम बुझाते रहे
के मेरी हिम्मत को आधियों ने भी सलाम कर डाला
मुद्दा ये है के तुम तक आंच पहुंचे मेरी फुगाओं की
हमने अपनी हस्ती को आतिश के नाम कर डाला
जो तुम्हें मेरा दिन में बुलाना रास न आया हो कभी
जा हमने अपनी साड़ी जिंदगी को शाम कर डाला
कोई तो जरिया होगा तुम तक आने का ये सोच
हमने अपनी हर रहगुज़र को तेरा मुकाम कर डाला

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