Sunday, 15 July, 2012

क्या करेंगे हम चाँद का  हमे दीया ही काफी है 
उसकी रौशनी पर सिर्फ मेरा ही इख्तेयार है 
चाँद के नखरे कौन उठाये के उसको गुरूर है 
के ज़माने भर को उसकी चांदनी से प्यार है ....
..
हाँ मेरा दीया सिर्फ मेरे खातिर ही  जलता है 
उस वजूद का हर कतरा मेरे लिए पिघलता है 
और चाँद बेचारा समझ ही नहीं पाता के वो 
खुद जलता है या सूरज के इशारों पे चलता है 
किस किस को बेचारा रोशन करे रात भर के 
ज़माने भर का उम्मीदों का उसपर उधार है ...

मेरा दीया रातभर मेरे घर का अँधेरा मिटाता है 
रोज़ रोज़ खुद को जलाता है और बुझाता है 
और चाँद के उजाले पर कोई क्या भरोसा करे 
कभी अपना आकर बढाता है कभी घटाता  है  
और फिर सो जाता है काली रातों में कई बार 
होता जब भी अपनी ही चांदनी से बेज़ार है ...

No comments:

Post a Comment