Wednesday 9 October 2013

कौन कहता है ज़िंदगी की शुरुआत सुबह से होती है ,
कुछ लोग तो शाम से भी सुबह का काम ले लेते हैं
मायूसी तो उनका गहना है जो डर के हालातों से,
सुबह होते ही घबरा के रात का दामन थाम लेते हैं ...

तुम्हें तो खुद पर फक्र होना चाहिए ए दोस्त मेरे के
तुमने अपने वक़्त से खुद ही जंग करने की ठानी है
वरना यहाँ तो लोग मजबूर होकर वक़्त के हाथों से
वक़्त को ही जिंदगी की हर हार का इलज़ाम दे देते हैं ...

सब्र को मत छोड़, सब्र जीना का सलीका सिखाता है
जब सब दोस्त छोड़ जाते हैं तो सब्र ही काम आता है
मगर फिर गुमशुदा होकर अपने ही गमों के सायों में
अक्सर हम खुद ही अपने सब्र का इम्तेहान लेते हैं ...

तुम शर्तिया जीत लोगे अपनी जिंदगी की हर बाज़ी
इस बात से तुम वाबस्ता हो, ज़माना भी वाकिफ है
हम भी कायल हैं तेरे बुलंद हौसलों के, ए यार मेरे
और तेरे इस हिम्मत ए जज़्बात को सलाम देते हैं ...

for all those who have not lost hope and keep on trying to reach their destination...

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