Tuesday 2 September 2008

फिर पहचान होगी.....

उनसे मिलने का न कोई जरिया है
न तरकीब और न उम्मीद कोई,
मगर इस बात पे ऐतबार है,
के ज़िन्दगी कभी तो मेहरबान होगी
कभी तो फिर मुलाक़ात होगी,
कभी तो फिर पहचान होगी....

2 comments:

  1. रात भर हुस्न की तारीफ़ करते सुनते
    वो अपने महबूब से कुछ कह न सकी
    अब वो ही जरिया , तरकीब , उम्मीद बिना
    बस एतबार के सहारे ज़िंदा है कहीं ?

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  2. behut behut sunder kavita hain... a shinking heart of a lover never leaves a hand of hope... aapne sunder pangtiyon main beyaan kiya hain... small and simple but still powerful... :)

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