Tuesday 30 September 2008

ऐसा भी हुआ कुछ....

ये आपकी नज़रे इनायत है जनाब हमारा जलवा नही
जो जादू सर चढ़ के बोले उसका खाना खराब है
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इतनी तारीफ़ न कर के में इतरा का आइना तोड़ दूं
कुछ झूठ बोला है , तो कुछ सच भी फरमाइये
ये मेरा जमाल नही आपकी आँखों का धोका है
हुजुर अब इस तरह मेरा गुरुर न बदाइए

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आपको आपकी खासियत का पता नही
इस नियामत को हमने महसूस किया है
जब कभी अपनों ने हाथ छोडा है मेरा
आपने झुक कर मेरा हाथ थाम लिया है

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हिज्र का आलम कुछ ऐसे बिताया गया
के तुझको ही सोचा किये
तुझको ही ज़हन में बिठाया गया.....

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मेरे मौला मेरे अजीज़, मेरी दीवानगी का कोई हासिल नही
जब जब जोगन बनी, तब तब उसका पता बिसर गया
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मेरी बातों पे यकीन हैं उन्हें इस बात का यकीन मुझे नहीं
कई बार मुझसे वादा खिलाफी हुई, कई बार वादा तोड़ा गया.....

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जिसके दर से दामन भरने की तमन्ना थी मेरी
उसका हाथ खैरात देने को उठा ही नही....

1 comment:

  1. Behut sunder lines likhi hain... jesse kisi khas din per mann main bhataktin kuch baatoin ko kalam ke raaste utaar diya hon... har sher aapne main ek matlab liye huye hain... keep it up.. its excellent work...

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