Tuesday, 23 September, 2008

जमाल-ए-रु

मुद्दा ये नहीं ये कौन आबाद है
मसला ये भी नहीं कौन बर्बाद हुआ
मोहब्बत का सिला एक ये भी है
न सबब का पता न सवाल का.....


जादू से छा जाते हो तुम मेरी हस्ती पे
नशा भी कुछ कुछ हो जाता है
तेरी दोस्ती के सदके मेरे हमसफ़र
मेरा मुझपे यकीं सा हो जाता है


ये मेरा कुसूर नही के कदम आपके डगमगाने लगे
एक आपकी नज़र नशीली है, एक आपका ....

No comments:

Post a Comment