Tuesday 16 September 2008

ख्वाब बुलाते रहे..

यहाँ हर शख्स कुछ ढूँढता है कुछ पाने की कोशिश में
अब किसको क्या मिले ये या किस्मत जाने या खुदा…


सुबह की आगाज़ हो गयी तेरे सलाम से
देखें अब अंजाम क्या होता है....


रौशनी बिखर जाती है दोस्तों का सलाम जब आता है
ज़र्रा ज़र्रा निह्कत भर जाती है
हर गोश मुस्काने लगता है जार जार
मेरा दिल भी तस्लीम करता है बार बार


कल फिर तुम्हें मेरे ख्वाब बुलाते रहे
तुमको मेहमान बनाने का इरादा था
न तुम आये न कोई पैगाम आया
मगर लुत्फ़ उस इंतज़ार में वसल से ज्यादा था...


आपकी खामोशियाँ बहुत आवाज़ करती हैं
कितने सुनसान उनसे आबाद होंगे
जो बे-जुबां होकर आप इतना कह जाते हैं
बयानी पे आपकी और कितने बर्बाद होंगे


हम जले हुए खुद हैं उनको क्या जलायेंगे
दिल की आग को आतिश से ही बुझाएंगे
मर कर किसने देखा है जनाब
हम तो जीते जी ही शमा बन जायेंगे

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