Tuesday 9 September 2008

बर्दास्त करना सिखाती हैं

हमारी हदें दरिया की लहरें हैं
जो बाँध बनने पे ही काबू आती हैं
उनकी हदें सागर सी गहरी हैं
जो साहिल तक आकर भी लौट जाती हैं
हमारी हसरतें एक जिद बन कर
अक्सर उन्हें सताती हैं
उनकी ख्वाइशें उनके लबों पे आकर
खामोश हो जाती हैं
हमारी मोहब्बतें एक तपिश बन कर
हमे दिन रात जलाती हैं
उनकी चाहतें चांदनी बनकर
नूर हमपर बरसाती हैं
हमे हमारी दूरियां हर वक़्त
हर लम्हा तड़पाती हैं
मगर उनकी मजबूरियां उनको ये दूरियां
बर्दाश्त करना सिखाती हैं...

2 comments:

  1. बहुत सुंदर अभिव्यक्ति!!



    -- शास्त्री जे सी फिलिप

    -- बूंद बूंद से घट भरे. आज आपकी एक छोटी सी टिप्पणी, एक छोटा सा प्रोत्साहन, कल हिन्दीजगत को एक बडा सागर बना सकता है. आईये, आज कम से कम दस चिट्ठों पर टिप्पणी देकर उनको प्रोत्साहित करें!!

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  2. its rally touch my heart...
    bahut acha likh rahi ho...
    khoobsurat..
    lubhavna..
    i m impressed

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