Friday 5 September 2008

शिकायतें

जब तेरे पास वक़्त ज्यादा था
ओर मुझपे वक़्त की महरबानियाँ न होती थीं
तब मेरे घर के दरीचे में अक्सर
उसकी परछाइयों की निशानियाँ होती थीं

वो हर लम्हा मुझपे निसार करता था
उसका हर ख्याल मुझसे ही वाबस्ता था
जब मेरे पास वक़्त कुछ कम होता था
तब उसको मेरे न मिलने पे परेशानियाँ होती थीं

सिर्फ मेरी बेबसी थी और उसकी बेशुमार शिकायतें
उसकी नाराज़गी थी ओर बेपनाह मोहब्बतें
लेकिन मेरे पास सिर्फ उसको देने को
मेरी मजबूरियों की कहानियां होती थीं

आज मेरे पास वक़्त है, उसके पास नहीं
हर लम्हा मेरा उसके तस्सव्वुर में गुज़रता है
अब मेरे यहाँ दौर-ए-खिजां है और उस तरफ
बहार है जहाँ कभी वीरानियां होती थीं

1 comment:

  1. Tab mere ghar ke dariche main aksar uski parchaayiyon ki nishaaniya hoti thi.. ab mere yehaan dorr-e-khijaan hain aur us taraf behaar hain jehaan kabhi viraaniyan hoti thi....
    kya baat hain.. kissi ka ek behut tadapta dil rota hain puraane dinon ko yaad kerke toh shaayad esse hi aawaj aati hain... Rita aapne behut ek aashiq ke rote dil ke shabon ko perfectly beyaan kiya hain... bedhaayiyaan... behut sunder kavita... :)

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