Friday 21 March 2014

कुछ बूँदें बादल की चुरा ली थी पिछली बारिश में
उन्हें अब जोड़ के हम अपना इक बादल बनाएंगे
जब सूख जायेगी गर्मी से हवाओं की मीठी ठंडक
ओढ़ा कर उस बादल को अपनी छत पे बरसाएंगे

कुछ तिनके भी चुराए थे परिंदों के आशियानों से
उन्हें जोड़ के हम अपना इक आबोदाना बनायेगे
जब उड़ा ले जायेगी आंधियां कच्चे घरोंदे हमारे
ओढ़ा कर तिनके अपनी छत पे नशेमन सजायेंगे

कुछ लम्हें भी चुरा लिए थे गुज़रते हुए वक़्त से
उन्हें जोड़ कर अपने होने कि मियाद हम बढ़ाएंगे
जब आलम होगा वक़्त-ए-रुख्सती का उस दिन
ओढ़ा के वक़्त को हस्ती पे, थोड़ा और जी जायेंगे...

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