Thursday 7 June 2012


देने को तो लोग खुदाई लुटा देते हैं
एक लम्हा मसर्रत को जान गवां देते हैं
फिर हमने कौन सा उनका जहाँ माँगा था
बस एक टुकड़ा आसमां माँगा था ...

वो बज़्म-ओ - महफ़िलें सजाते हैं
दुनिया भर के आशिकों को बुलाते हैं
फिर हमने कौन सा उनका आशियाँ माँगा था
बस एक टुकड़ा आसमां माँगा था ....

वो खुद खुलेआम ख़त भिजवाते हैं
उसपर ज़माने भर से ताकीदें करवाते हैं
फिर हमने कौन सा उनका बयान माँगा था
बस एक टुकड़ा आसमां माँगा था ....

कसमें खाते हैं और वादे भूल जाते हैं
दैरो-हरम के किस्से अक्सर सुनाते हैं
फिर हमने कौन सा उनका ईमान माँगा था
बस एक टुकड़ा आसमां माँगा था....

मसर्रत - happiness, बज़्म-ओ - महफ़िलें- parties, आशियाँ - house,
ताकीदें -orders, बयान - explanation, दैरो-हरम - places of worship, ईमान - Conscience

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