Wednesday 27 August 2008

एक चिठ्ठी

शिकायत करते हैं वो अहवाल न देने की, मगर,
अब उनकी चिट्ठी तक नहीं आती,
कभी गुफ्तगू हो जाती थी, लेकिन,
अब तो उनसे आवाज़ तक सुनाई नहीं जाती
न कोई पैगाम, न रुक्का,
न कई दिनों से कोई खैरीयत की खबर
आजकल उनसे हमारी बात करने की
फरमाइश भी पूरी करी नहीं जाती
पहले कभी एक खुशबू उनकी
हवाएँ ले के आती थी
अब हमारे देश की बदली
वहाँ के अस्मा पे नहीं छाती
वक़्त वक़्त की बात है,
वक़्त से कोई शिकायत की नहीं जाती
जिसके लिए बैचैन हो उठते हैं आज भी,
उसको हमारी याद तक नहीं आती

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