Wednesday, 27 August, 2008

पत्थर दिल ....

तेरे पत्थर होने का हमको इल्म न था
वरना हर चोट का तुझको ही इल्जाम देते
ज़ख्मों की फेहरिस्त तेरे नाम की होती
लहू के कतरे गिरने पे तेरा नाम लेते...

चोट लगी दिल पे तो तब ये जाना
के शिद्दत दर्द की क्या होती है
गर ये पहले जान जाते ए जालिम
तो सोच समझ के यहाँ हर गाम लेते

गर बिकती कहीं पे दवा इस मर्ज़ की
ले आते दर्द से निजाद पाने को
फिर चाहे खुद को फना करना पड़ता
मगर चारागर को मुह माँगा दाम देते...

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